वर्धा। एक अच्छे मकसद से शुरू किए गए किसी संस्थान को व्यक्तिगत विचारधारा और स्वार्थ किस कदर मिट्टी में मिला देते हैं, इस बात की जीती जागती मिसाल बन गया है वर्धा में स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय। सारी दुनिया में हिंदी को सम्मानित दर्जा दिलाने के मकसद से इस विश्वविद्यालय की शुरुआत की गई थी। इस विश्वविद्यालय की परिकल्पना इतनी हाईप्रोफाइल थी कि लोगों को लगा था कि यह विश्वविद्यालय हिंदी के अंतरराष्ट्रीयकरण में मील का पत्थर साबित होगा। लेकिन आज की तारीख में हालात यह हैं कि खुद यह विश्वविद्यालय अपनी पहचान के लिए संघर्षरत है। फिलहाल इस विश्वविद्यालय की पहचान अंधा बांटे रेवड़ी वाली होकर रह गई है। जिसके हाथ में पॉवर है वह अपने-अपने लोगों को उपकृत करने में लगा हुआ है। अपने निजी स्वार्थों के लिए यहां सारे नियम-कायदों को ताक पर रखकर मनमानी की जा रही है।
हिंदी के नाम पर इस विश्वविद्यालय में हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। इस खर्च से हिंदी का तो कोई भला नहीं हुआ। लेकिन यहां के पदाधिकारियों ने अपनों को रेवड़ी बांटकर खूब उपकृत किया। 1997 में महात्मा गांधी के नाम पर स्थापित किया गया यह विश्वविद्यालय जेएनयू की तरह एक खास विचारधारा के लोगों के कब्जे में है। यह लोग मनचाही नियुक्ति और मनचाहे परीक्षा परिणाम की घोषणा कराने तक का माद्दा रखते हैं।
विश्वविद्यालय के तीसरे कुलपति के तौर पर 1995 बैच के आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय को आए 10 महीने हो चुके हैं। लेकिन इस विश्वविद्यालय में शोध और शिक्षण कार्य के अलावा बाकी सभी काम हो रहे हैं। प्रति कुलपति प्रो. नदीम हसनैन की अध्यक्षता में होने वाली प्रवेश प्रक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं। अपने विद्यार्थियों को प्रवेश दिलाने के लिए नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाना इस विश्वविद्यालय की पहचान बन रही है। अगर यह विश्वविद्यालय इतने प्रचार-प्रसार, तामझाम और खर्च के बावजूद आज छात्र जुटाने में तक नाकाम है तो इसके लिए यहां हो रही गड़बड़ियां ही जिम्मेदार हैं।
हाल ही में विश्वविद्यालय में एम फिल और पीएचडी प्रवेश के लिए इस्तेमाल किए गए दांव-पेच बेहद शर्मनाक रहे। इस दौरान कुलपति विदेशी दौर पर थे और विश्ववद्यालय में धांधलियां अपने चरम पर थीं। पहले दौर में इन प्रवेश के लिए लिखित के मुकाबले ग्रुप डिस्कशन और इंटरव्यू में खूब गड़बड़ियां हुईं। इस गड़बड़ी की जांच में नवनियुक्त प्रोफेसर और जाने-माने पत्रकार और रीडर शामिल पाए गए। शोध में प्रवेश के लिए देश भर से आए बाहरी छात्रों का पहली बार में ही सफाया कर दिया गया। इसके बावजूद अपने छात्रों को पूरी तरह जगह न मिलने की वजह से परीक्षा रद्द कर दी गई। हैरानी की बात यह है कि गड़बड़ी के आरोपों के बावजूद दोबारा प्रवेश परीक्षा कराने की जिम्मेदारी प्रति कुलपति प्रो. हसनैन को ही दी गई, जबकि साफ छवि के कई सीनियर प्रोफेसर और शिक्षक मौजूद थे।
पीएचडी जनसंचार की दोबारा आयोजित की गई प्रवेश परीक्षा में दिखावटी पारदर्शिता के लिए विभागीय हस्तक्षेप को हटाया गया। यह भी पता चला है कि प्रति कुलपति के खास व्यक्तियों को गुपचुप यह बता दिया गया कि दोबारा होने वाली पीएचडी-जनसंचार की परीक्षा में एम फिल पाठ्यक्रम से सवाल पूछे जाएंगे। ऎसा हुआ भी। लिखित परीक्षा के परिणाम से यह बात साबित हो गई क्योंकि इसमें ज्यादातर एक ही समूह के छात्र पास हुए और संतुलन दिखाने के लिए बाद में तीन सीटें बढ़ाकर एक-दो छात्रों को शामिल किया गया।
दोबारा प्रवेश परीक्षा लिए जाने के पहले पुराने पैनल को पूरी तरह हटाए जाने की बात कही गई थी, लेकिन अपने मनचाहे छात्रों को लाने की नीयत में प्रति कुलपति ने रातोंरात मूल्यांकन अपने घर में करवाया, जिसमें दूसरे किसी व्यक्ति को शामिल नहीं किया गया। इस प्रवेश प्रक्रिया में किसी भी पैनल में अनुसूचित जाति/जनजाति के प्रतिनिधि के तौर पर किसी को भी नहीं रखा गया। इन सभी बातों से विश्वविद्यालय पदाधिकारियों की मनमानी साफ जाहिर होती है। लेकिन विश्वविद्यालय में लगातार हो रही गड़बड़ियों की आवाज न उठे और विश्वविद्यालय की बदनामी न हो इसलिए कुलपति भी खामोश नजर आते हैं। जाहिरा तौर पर मूल्यांकन का वन मैन शो खतरनाक ही नहीं शर्मनाक भी है।
कहने में कोई गुरेज नहीं कि यह विश्वविद्यालय धीरे-धीरे मठाधीशों का अड्डा बनता जा रहा है। यहां के सभी विद्यापीठ में लिखित और मौखिक परीक्षाएं इतनी देर से होती हैं कि छात्र दूसरे संस्थान में प्रवेश के लिए एक साल बर्बाद करते हैं। यकीनन इसके लिए विभागाध्यक्ष ही जिम्मेदार हैं। इतना ही नहीं इस विश्वविद्यालय में शिक्षा और बुनियादी जरूरतों को छोड़कर विमर्श के नाम पर गैरजरूरी बजट खर्च किया जा रहा है। ताकि डिस्कशन के नाम पर अपने खास लोगों को समय-समय पर चेक थमाकर उपकृत किया जा सके। जबकि यहां पिछड़े और दलित छात्रों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। ऎसे हालात में यह विश्वविद्यालय हिंदी के नाम पर कब तक और कितनी प्रतिभाओं को कुचलेगा यह कोई नहीं जानता। इतना तो साफ है कि हिंदी को अंतरराष्ट्रीय दर्जा दिलाने के मकसद से शुरू किया गया यह विश्वविद्यालय फिलहाल राष्ट्र में ही संकट के हालात से गुजर रहा है। अगर इसे मठाधीशों के चंगुल से मुक्त नहीं कराया गया तो इस विश्वविद्यालय को लेकर देखा गया सपना हमेशा के लिए सपना ही रह जाएगा। (यह आलेख हमें विश्वविद्यालय के एक छात्र ने ईमेल से भेजा है। अगर इस पर कोई अपना पक्ष रखना चाहता है तो हम उसका स्वागत करते हैं। आप हमें editor@voiceofmedia.com पर मेल कर सकते हैं हम उसे जरूर प्रकाशित करेंगे। संपादक)
कुर्सी के खेल में चौबे जीते, चमड़िया हारे!

अथ श्री अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय कथा...
वर्धा, वीओएम ब्यूरो, 23 अप्रैल, 2010
आखिरकार वही सच निकला जिसकी आशंका थी। अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में शुरू से ही जिसे लेकर कयास लगाए जा रहे थे, वह अब सच बनकर सामने आने लगा है। धुंध छटने लगी है और वहसच साफ-साफ दिखने लगा है जिसे लेकर लोग पहले से कानाफूसी कर रहे थे। यह बहुत पहले से कहा जा रहा था कि अनिल चमड़िया के टर्मिनेशन में कृपाशंकर चौबे की सक्रिय भूमिका रही है।अखिरी दिनों में कृपाशंकर चौबे केवल दिखावे के लिए अनिल चमड़िया के साथ थे और इस आंतरिक कलह को इन दोनों के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग भांप चुके थे।यह बात तब और खुल कर सामने आ गई थी जब 27 जनवरी की शाम को विश्वविद्यालय के इकलौते कैंटीन में, विश्वविद्यालय में आए एक अतिथि प्राध्यापक से अनिल चमड़िया का परिचय कराते हुए कृपाशंकर चौबे ने कहा थाकि यह हैं प्रो. अनिल चमड़िया, जो कुछ देर में 'एक्स' हो जाएंगे।उस समय अनिल चमड़िया की हालत देखने लायक थी। वह समझ नहीं पा रहे थे कि वह इसे क्या मानें- अपने दोस्तकी हंसी-ठिठोली या कृपाशंकर चौबे द्वारा किया गया कटाक्ष ? 27 जनवरी, 2010 वही दिन था जिस दिन अनिल चमड़िया को टर्मिनेशन लेटर दिया जाने वाला था और उस समय तक कृपाशंकर चौबे अपना खेल खेल चुके थे-अनिल चमड़िया को यूनिवर्सिटी सेबाहर करवाने का खेल।
दरअसल कृपाशंकर चौबे इस बात को पचा नहीं पा रहे थे कि उनके ही मित्र अनिल चमड़िया उसी संस्था में प्रोफेसर हैं जहां उनकी नियुक्ति बतौरएसोसिएट प्रोफेसर हुई है। वह इस कोशिश में लग चुके थे कि कैसे अनिल चमड़िया को यहां से बाहर करवाकर उनकी कुर्सी हथियाई जाए। अनिल चमड़िया को बाहर करवा चुके चौबेजी अब उनकी कुर्सी पर भी काबिज हो गए हैं।यह बातें लगातार आ रही थी कि चौबेजी अपने छोटे से कमरे में खुद को कुंठित महसूस कर रहे थे। उनकी नजर अनिल चमड़िया के बड़े कमरे, बड़ी कुर्सी और बड़े पद पर लगी हुई थी। विश्वविद्यालीय सूत्रों से पता चला है कि 22 अप्रैल को चौबेजी उसी बड़े कमरे और बड़ी कुर्सी पर काबिज हो गए जो कभी उनके दोस्त चमड़ियाजी की हुआ करती थी। अब रही बात उनके पद की तो अनिल चमड़िया के जाने के बाद जो पद खाली हुआ है और उसके लिए जो रिक्ति विश्वविद्यालय ने निकाली है, उसके लिए चौबेजी अभी से जोर-शोर से लगे हुए हैं और अपनी दावेदारी पक्की करने की जुगत में हैं। अपनी इसी योजना (प्रोफेसर बनने की योजना) को कामयाब करने के लिए वह आजकल कुलपति और विश्वविद्यालय के गुणगान में लेख पर लेख लिखे लिखे जा रहे हैं, क्योंकि चमड़ियाजी के कमरे और कुर्सी के बाद अब मात्र उनका पद हासिल करना बच गया है।