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न्यूज़ चैनल राहुल महाजन की खबर को इस तरीके से दिखा रहे थे मानो कन्यादान उन्ही को करना हो। असल में यह चमकता-दमकता समाचार व्यवसाय ही है जो कभी बाबा की खबरों के जरिये उस मातम में मौजूद उस मां के कराहने को दिखाता और सुनाता है जो आज भी सुबक रही है तो कभी जाला लगी डिबेट न्यूज़ पर संदेह करता है और ‘राहुल महाजन की शादी’ दिखाकर भारत और उसमे न्यूज़ होने का मतलब समझाने की कोशिश करता है।

  • बदनसीबों की मौत पर आंसू न बहाओ, जश्न मनाओ राहुल की शादी है

    Ashish-आशीष जैन

    राहुल की शादी है और जश्न है हिदुस्तान का...दूसरी तरफ इस चकाचौंध से बहुत दूर एक गांव है जहाँ कुछ देर पहले एक साधु आया था।पता नहीं क्या हुआ, वहां अब सन्नाटा पसरा है।पीछे से एक मां के कराहने की आवाज़ आ रही है जिसकी रुलाइयां है जो रोके रुक नहीं रहीं।वो सन्नाटे से आगे निकल कर उस आस्था पर सवाल उठा रही हैं जिसे वक्त-वक्त पर कोईन कोई साधु उसकी असफलता के साथ जोड़कर उसके पल्लू से बाँध देता है और फिर राम के नाम में विश्वास जताता है। वो एक रुमाल एक लौटा और बीस रुपये बाटता है तभी एक चीख पुकार आती है।

    कई लोग बदहवासी में इधर उधर भागने लगे।भीड़ अपनों और परायों में भेद नहीं कर पाई और फिर हर तरफ मातम।लोग बिखरे हुए थे।देश की संसद के साधु अपनी सियासत को खीच कर उस मां के कंधे पर हाथ रख रहे हैं,लेकिन वो आका भी सफलता और असफलता के बीच फस रहे हैं। बड़ी-बड़ी गाड़ियां इससे पहले उस जगह कभी नहीं आई।उस मां ने इतने करीब से इन लोगों को कभी नहीं देखा।एक सवाददाता तभी तल्खी से माइक निकालकर यह बात कहता है,हमने कई साल से आपको कई खबरें दिखाई है लेकिन आज मैं इन लाशों के बीचमौजूद हूं। तभी वो स‌ंवाददाता अचानक अपनी पीटीसीख़त्म कर देता है और वो कहता है आज मेरे पास शब्द नहीं हैं।उसकी आँखों में आंसू है,जो दर्शक जानता है,वो फूट फूट कर रोता है।

    sआस्था ने एक बार फिर कुछ छीन लिया।कईपरिवार वीरान हो गए।बस यादें रह गई,जिन्हें समेटना बहुत मुश्किल है।लेकिन उस बाबा का क्या? उस मां को अब वो बीस रुपये भी याद नहीं, जो बाबा ने उसको दिए थे। उसे तो अपने बेटे की वो हथेलियाँ याद है जो उस बाबा ने छीन लीं। जो वक्त-वक्त पर कई चैनलों पर भी दिखता है।वो बताता है आस्था एक बहुत बड़ी चीज़ है।वो राम का नाम लेता हैऔर सलाह देता है कर्म करते जाओ।वो भंडारे में पैसे बांटता है। दूसरी तरफ टीवी न्यूज़ चैनलों में चहल कदमी है।लोग माथे पर हाथ रखकर बैठे हुए,आखिर ये हो क्या हो रहा है,बड़े-बड़े न्यूज़ संस्थानों में माथे की नसें फटने वाली बहसे हुईं।ख़बरों पर या शादी पर,हम किस पर बने रहेंगे,यह एक टीसने वाला सवाल था।ख़बरों और तमाशे में कोई तो अंतर होना चाहिए। तभी रन डाउन से आवाज़ आई,सर क्या करूँ?कृपालु महाराज वाली खबर गिरा दूँ,लगता है चलेगी नहीं,यह वही खबर थी जिस पर राहुल गाँधी,राजनाथ को ज़मीं से जुड़े होने की याद आ गई थीऔर इतिहास गवाह है इससे पहले इतनी गाड़ियां उन गरीब लोगों के बीच कभी नहीं देखी गई।

    उत्तर प्रदेश का मतलब तो आप जानते हैं?...मायावती कह रही है हमारे पास उन लोगों को देने के लिए पैसा नहीं है!तीसरी तरफ एक सरसरी आवाज़,कंपाने वाला संगीत....राहुल महाज़न पत्नी वियोग और चाचा के जाने से आहत से बहुत दूर होकर नुमाइशों में बिजी हैं, जहाँ कुछ लड़कियां और एक लड़का और बहुत सारे कैमरे हैं, जो चकाचौंध रौशनी के सामने अपनी ज़िन्दगी में किसी को दाखिल करने के लिए आई है।राहुल महाज़न दूल्हे के रूप में दुबारा एक शानदार किरदार निभा रहे हैं। कुछ देर बार वो वरमाला पहनाएंगे। तभी देश की सभी खबरें अचानक गिरने लगीं। सभी चैनल शादी की 'खबर' पर आ गये।बड़े बड़े ग्राफिक्स के साथ राहुल महाजन का स्वयंवर जारी था।

    pपत्रकारिता के दिग्गज यह बात जानते थे की खबर बिकेगी और सही भी था। विदेश नीतियां,बाबा,महिला आरक्षण,पाक वार्ता पर राहुल महजान हावी हो गए ...भारतीय समाचार नीति की ऐसी दूरदर्शी आलोचना की तरह देखा जा रहा है जिस पर पहले किसी की नजर न पड़ी तो इसके पीछे लोगों का अज्ञान ज्यादा है।इस तरह की ख़बरों की उत्कृष्टता कम।अन्यथा हाल के वर्षों में भारत में और दुनिया भर में टीवी को लेकर जो बुनियादी बहसें चल रही हैं,न्यूज़ चैनल राहुल महाजन की खबर को इस तरीके से दिखा रहे थे मानो कन्यादान उन्ही को करना हो। असल में यह चमकता-दमकता समाचार व्यवसाय ही है जो कभी बाबा की खबरों के जरिये उस मातम में मौजूद उस मां के कराहने को दिखाता और सुनाता है जो आज भी सुबक रही है तो कभी जाला लगी डिबेट न्यूज़ पर संदेह करता है और ‘राहुल महाजन की शादी’ दिखाकर भारत और उसमे न्यूज़ होने का मतलब समझाने की कोशिश करता है। शायद टीआरपी स‌िस्टमउसे इस बात की इजाज़त और इज्ज़त दोनों देता है, जिसके सहारे वो नंबर वनबन जाता है। वो अच्छी खबरों को दिखाकर मुश्किल रास्ता नहीं चुनता। जरूरी बहसों में शामिल होने की फुरसत नहीं निकलता। वो सरलता के साथ खड़ा होकर राहुल महाजन के साथ दिखता है।वो जानता है की वो गलत है तभी वो अपनी गिरेबां में झाकने के लिए वो खबरें चलाता है, जो उसकी बौद्धिक खुराक पूरी करती हैं।

    इस लोकप्रियता को समाचार माध्यम भुनाना चाहें, यह समझ में आता है क्योंकि उनका यह तमाशा बिक्री और कारोबार से जुड़ा है।लेकिन यह लोकप्रियता जिस तरह हमारे समूचे सामाजिक,साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल पर छा रही है, इससे कुछ डर सा लगता है।लगता है, जैसे हम एक ग्लैमर भरेमाहौल में रह रहे हैं। जहां एक बाजारू बौद्धिकता चीजों का मूल्य तय कर रही है।अगर वह बाजारू न होती तो लोकप्रियतावाद से इस कदर अभिभूत न होती।इस बात को कुछ आगे बढ़ाने से बात ज्यादा खुलेगी। अफ़सोस है कि बौद्धिक व्यवस्था पर उस व्यवस्था का कब्ज़ा है जिसे कोई और तय करता है,जिसके मानक एक सिरे से खारिज होने जरूरी हैं,वर्ना ऐसी शादियां होती रहेंगी, जिसमे हर कोई कलाकार है और न्यूज़ का तमगा सिर्फ यहीं तक सीमित रह जायेगा। असल में यह एक हताश कर रख देने वाला जवाब है कि बाज़ार हमारी खबरों को तय कर रहा है कहीं न कहीं सवाल एकाधिकार का है जो बाज़ार से जुड़ा हुआ है,जो वक्त-वक्त पर बार-बार फूट फूट रहा है। मैं तो बस इतना कहूँगा राहुल महाजन तुम धन्य हो। (लेखक के ब्लॉग स‌लाम जिंदगी स‌े स‌ाभार)

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