-संजय द्विवेदी
इलेक्ट्रानिक मीडिया के हिस्से आलोचनाएं भले ज्यादा हों पर उसकी ताकत को नकारा नहीं जा सकता । कुरूक्षेत्र के प्रिंस प्रकरण (जिसकी काफी आलोचना हुयी) ने जहाँ मीडिया की संवेदनशीलता, प्रभाव और सरोकारों को साबित किया था, वहीं यह भी संदेश दिया कि मीडिया चाहे तो अपने सकारात्मक संचार से पूरे देश को एक सूत्र में बांध सकता है। संचार की यह सकारात्मकता बहुत कम इसलिए महसूस की जाती है क्योंकि इसका इस्तेमाल अकसरनहीं होता। सेक्स, अपराध, स्कैंडल, सिनेमा या पापुलर कल्चर के आजमाए और ताकतवर फार्मूले मीडिया का मुख्य खबर हैं। शायद ऐसा इसलिए भी क्योंकि इलेक्ट्रानिक मीडिया में लगी पूँजी उसे बहुत सरोकारी और संवेदनशील होने से रोकती है। सरोकार यदि बाजार में ‘हिट’ हो तो ठीक, वरना यह पूँजी कोई ‘रिस्क’ लेने लो तैयार नहीं है। बिके तो देशभक्ति भी चलेगी, प्रिंस भी, बुधिया भी, ऐश-अभिषेक, राखी सावंत, बाबा रामदेव, धोनी, राजू श्रीवास्तव भी और अपने पुराने जनम के किस्सों को याद करते शेखर सुमन भी। बिकने पर हमें राज ठाकरे से भी एतराज नहीं है। नहीं तो कुछ भी नहीं।
बाजार अगर बाबा रामदेव भी दिलाएं तो कबूल है। यह बाजार अगर ‘इंडियन आइडल’ या तमाम प्रतियोगिताओं के रोते-बिलखते असफल प्रतिभागी बनाएं तो भी कबूलहै। दरअसल मीडिया 'पापुलर' का पीछा करता है। वह रोज नई कथाओं, नए नायकों की तलाश में रहता है। उसका शिकार हर वह ‘कथा’ है जो उसे छोटे पर्दे पर स्वीकार्य और दर्शकों को खींच सकने लायक बनाए। कथाओं में कथाएं तलाशते मीडिया को इसीलिए कभी नैतिक पुलिस के से नवाजा जाता है, तो कभी कोर्ट की फटकार लगती है। सही अर्थों में मीडिया अपना ‘आनंद लोक’ रचता है और दर्शकों को उसमें शामिल कर लेता है। भविष्यवक्ता कुंजीलाल की मौत के दावे हों या प्रिंस की जान का सांसत में पड़ना-सब कुछ इसी ‘आनंदलोक’ का हिस्सा रहा है। किसी भी मौत का इंतजार करते हुए पूरा दिन गुजार देना और मौत का न आना-यही तो कुंजीलाल कथा है। पर कथा कही गयी, कई अर्थों में रची गयी और उससे ज्यादा देखी गयी। कुंजीलाल उस दिन मीडिया का ‘प्रिंस’ बना रहा। फिर बुधिया की दौड़ उसे ‘प्रिंस’ बनाती है।
कथाएं तलाशता खबरिया चैनल पटना के प्रोफेसर मटुकलाल और उनकी शिष्या के ‘प्रेम’ को राष्ट्रीय विमर्श में तब्दील कर देता है। प्रोफेसर की पत्नी की पीड़ा उपहास में बदलती दिखती है। उसकी शिष्या अचानक नायिका में तब्दील हो जाती है। बस चलता तो मीडिया प्रोफेसर को ‘हिंदुस्तानी सेंट वेलेंटाइन’ में बदल देता। किंतु यह ‘प्रिंस’ की तलाश दृश्य माध्यम की मजबूरी है। उसे नायक चाहिए। उससे जुड़ी कथाएं बताता मीडिया इस वाचिक परंपरा के देश को ‘सूट’ करता है। नायक अपने साथ नए विमर्श खड़े करता है या मीडिया उसे गढ़ता है। यह है मीडिया का नया चेहरा, जो जो हमें चमत्कृत कर रहा है। वही लाइट, एक्शन और लाइव का तमाशा।
सरोकारों की कथाएं सुनाता खबरिया चैनल कहता है, भेजिए एसएमएस, कीजिए दुआ। एसएमएस से झोली भर जाती है। हम भूल जाते हैं कि एसएमएस का अर्थ होता है पैसा, जिससे चैनल वाले अपनी झोली भरते हैं। मीडिया का कैमरा पापुलर के पीछे भागता है। वह पापुलर की गालियाँ खाता है फिर भी उसके पीछे जाता है। कई बार सौदे भी करता है। सौदे में निकली कथा बदल जाती है। एक लाइव हाहाकार में। यह मीडिया कभी इस्तेमाल होता है, कभी लोग इसका इस्तेमाल कर लेते हैं। राखी सांवत-मीका जैसी कहानियों में दोनों के लक्ष्य सधते हैं। एक की टीआरपी बढ़ती है, दूसरे के शो के रेट बढ़ जाते हैं। इलेक्ट्रनिक मीडिया सिर्फ पापुलर विमर्श में रूचि दिखाता है। उसे दिखना है, बिकना है और इसी में उसकी मुक्ति है।
शिल्पा शेट्टी की शादी पर पंडितों सरीखे मंत्र पढ़ते चैनल। बिकनी के 60 साल पूरे होने पर कथाएं सुनाते चैनल। कारगिल पर देशभक्ति गीत गाते चैनल। राखी सांवत के आनंद लोक में भटकते चैनल। कुंजीलाल की मौत का इंतजार करते चैनल। किसी के पुनर्जनम की कथा सुनाते या सच का सामना करते चैनल, एक ऐसा इंद्रधनुष रचते हैं, जहाँ विवेक अगवाहो जाता है। रह जाती है तो सिर्फ टीआरपी की दौड़। आप इन चैनलों को बचकाना कह रहे हैं? मत कहिए! अब वे व्यस्क हो चुके हैं। (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)
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