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    बिहारी हो,  तब तो हिंदी मीडिया में नौकरी पक्की! 

    दिल्ली यूनिवर्सिटी स‌े पीएचडी कर रहे विनीत कुमार का यह आलेख हमने उनके ब्लॉग ताना-बाना स‌े लिया है। इस पोस्ट में विनीत ने बड़ी ही बेबाकी स‌े हिंदी मीडिया में आने वाले पत्रकारों की स‌ोच, स‌मझ और माहौल के स‌च का खाका खींचा है। इस मुद्दे पर आप भी अपनी राय हमें जरूर भेजें-संपादक।

    बीस हजार से लेकर दो लाख तक की फीस देकर कोर्स करने वाले और अब नौकरी के लिए दर-दर भटकने वाले बिहार के मीडिया स्टूडेंट शायद पोस्ट का शीर्षक देखकर ही भड़क जाएं। उन्हें इस पर भारी आपत्ति और असहमति हो सकती है। संभव है हम मे से कई लोग इसे आरोप के तौर पर लें, मीडिया हाउस के अंदर काम कर रहे लोगों को बदनाम करने की साजिश समझें लेकिन ऐसा क्या है कि हमने बिहारी हो न, तब चिंता काहे करते हो, तुम्हारी नौकरी तो रखी हुई है मीडिया में सुन-सुनकर कोर्स पूरा किया। कोर्स करने के दौरान जब भी हम चिंता जताने की कोशिश करते कि किसी तरह कोर्स तो कर ले रहे हैं लेकिन नौकरी कैसे मिलेगी, तभी साथ के कुछ लोग हमारे ऊपर पिल पड़ते- ज्यादा बनो मत, स्साले बिहारी, तुम लोगों को तो बुलाकर नौकरी दी जाएगी। इसी एक लाइन को सुन-सुनकर कुछेक साउथ इंडियन क्लासमेट स्साले बिहारी बोलना सीख गयी थी और हम उन पर फिदा हो जाते जबकि किसी लौंडे के बोलने पर मार करने तक की नौबत आ जाती। नौकरी की बात चलते ही हम लोगों को ठीक उसी तरह ट्रीट किया जाता जैसे जेनरल से आने वाले लोग कैटेगरी से आने वाले लोगों के बारे में कहा करते हैं- उसका क्या, उसका तो कोटा हैनौकरी तो धरी हुई है उसकी, पढ़े चाहे नहीं पढ़े।

    ऐसी स्थिति में जाति और क्षेत्र पर भरोसा न होते हुए भी भीतर ही भीतर एक निश्चिंतता बोध पैदा होता कि चलो, नौकरी तो मिलनी ही है। वो नौकरी जिसमें कोर्स अच्छी तरह करने से ज्यादा बिहारी होने के क्रेडिट पर मिलनी है। कोर्स में तो फिर भी किसी तरह की झंझट और प्रोजेक्ट में हमसे ज्यादा लड़कियों को नंबर देकर आगे-पीछे किया जा सकता है लेकिन हमसे, हमारे बिहारी होने का क्रेडिट कोई छीन नहीं सकता। लेकिन इससे अलग एक दूसरी स्थिति ये भी बनती कि साथ के लोगों को जिनमें से ज्यादा बिहार के नहीं होते, नौकरी के मामले में हम लोगों से बराबर इर्ष्या का भाव बना रहता। जब वो कहते, हिन्दी मीडिया में नौकरी करनी है तो बिहार से पैदा होकर आओ तो कभी तो अच्छा लगता कि चलो इन्हें कहीं न कहीं बिहार की औकात का अंदाजा तो है, लेकिन बाद में जिस रुप में हमने चीजों को समझा, व्यवहार को जानने की कोशिश की, उससे साफ अंदाजा लग गया कि ये हमारे लिए कितनी खतरनाक स्थिति है। हमारी नौकरी मिलने से पहले ही हमें कैसे नौकरी मिली है का लेबल चस्पा दिया गया है। अफसोस कि ऐसी मानसिकता पैदा करने के हम ही जिम्मेदार रहे हैं। हमें ही चैनल का नाम लेते ही उसमें अपनी बिरादरी का कोई भाई, चचा या फूफा याद आ जाता है। हम जाति और क्षेत्र आधारित पीआर बनाने में फंसे रह जाते हैं, प्रोफेशन के स्तर पर अपने को कम ही चमकाते हैं। जिस किसी में कम योग्यता है, वो इसे रिप्लेस करते हुए संबंध, जाति और क्षेत्र की प्लेसिंग करने लग जाता है। ऐसा करके वो जुनइन बिहार के लोगों ( मीडिया के लिए) की जड़ो में मठ्ठा घोलने का काम करते हैं, इसका अंदाजा नहीं लगा पाते। जो जब-तब नफरत और उपेक्षा के तौर पर सामने आता है। ऐसे में अब आप लाख कहते रह जाइए कि हमने इंटरव्यू में ये कर दिया, वो कर दिया फर्क नहीं पड़ता। दिल्ली के भारतीय विद्या भवन में हमने इसी महौल में रहकर कोर्स पूरा किया।

    माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से मीडिया कोर्स करने अब भोपाल में ही अखबार में काम करने वाले एक साथी ने फोन करके बताया- माखन लाल में जब लोग मीडिया का कोर्स करने आते हैं तो बिहार के लोगों का दबदबा इतना अधिक होता है कि भोपाल और एमपी के दूसरे हिस्से से आए लोग अपने को बहुत ही नेग्लेक्टेड फील करते हैं। नतीजा ये होता है कि पूरी क्लास या बैच दो खेमें में बंट जाती है- बिहार से आए लोग एक तरफ और देश के बाकी हिस्सों से आए लोग एक तरफ। आपको लगेगा ही नहीं कि वो मीडिया में काम करने के लिए अपने को तैयार कर रहे हैं, लगेगा कि अखाड़े में लड़ने के लिए अपने को तैयार कर रहे हैं। बात अगर व्यक्तिगत स्तर पर करुं तो बिहारी औऱ नॉन बिहारी को लेकर खेमेबाजी मैंने देश के तीन-चार संस्थानों में स्पष्ट तौर पर देखी है, पता नहीं बाकी संस्थानों की क्या स्थिति है?

    जातिवाद और क्षेत्रवाद का विरोध करने के वाबजूद अगर आपकी नौकरी का संबंध जाति और क्षेत्र से हैं-मतलब कि अगर आपको ये लगे कि सामने बैठा बंदा जिसके हाथ में नौकरी देने की ताकत है वो हमारी जाति या क्षेत्र का है तो इंटरव्यू के दौरान आप ज्यादा कॉन्फीडेंस फील करते हैं। अपने एक क्लासमेट की भाषा में कहूं तो- अरे इसको इंटरव्यू नहींये कहो तो सही रहेगा, जात-बिरादरी का मामला था,  हो गया। नौकरी के लिए जिन्होंने इंटरव्यू लिया उन्होंने मेरा प्रोफाइल देखते ही कहा- मैंने भी हिन्दी से ही एमए किया है। इतना सुनते ही मेरे भीतर जाति और क्षेत्र वाला आत्मविश्वास पहले खत्म हो गया था क्योंकि बातचीत के दौरान पहले राउंड में इंटरव्यू देकर आए लोगों ने बता दिया था कि वो बिहार से नहीं हैं और मेरी जानकारी के लिए ये भी बता दिया कि वो तुम्हारे बिरादरी से नहीं है। हिन्दी सुनकर खोया हुआ आत्मविश्वास फिर से लौट आया- मन ही मन सोचा, एक हिन्दी वाला, हिन्दी वाले की प्रतिभा और दर्द को नहीं समझेगा तो कौन समझेगा और वो भी ऐसे महौल में जहां ऑडिएंस के सामने आउटपुट के तौर पर हिन्दी में चीजें लानी होती है लेकिन अंदर का महौल अंग्रेजीदां होता है। ऐसे में हम जाति और क्षेत्र से ऊपर उठकर विषय पर आकर स्थिर हो गए। मौके के हिसाब से हमारा आत्मविश्वास क्षेत्र के बजाय सब्जेक्ट पर आकर शिफ्ट हो गया। लेकिन इतना तय था कि जिंदगी में हर जगह इंटरव्यू लेने वाला हिन्दी का नहीं होगा।

    कोर्स के दौरान पूरी हिन्दी मीडिया खासकर न्यूज चैनलों के मामले में हम जो समझते आए कि बिहार का होने से मामला आसानी से बन जाता है, धीरे-धीरे भरभराकर टूट जाता है। हममें से कोई भी जो कि क्षेत्रवाद पर भरोसा नहीं करता है, उसे लगता है कि उसे उसकी योग्यता के हिसाब से जाना-पहचाना जाना चाहिए, उसे ऐसी स्थिति में खुश होना चाहिए। लेकिन चैनलों की जो समझ हमें आसपास के लोगों से मिल रही थी उसके हिसाब से कोई चैनल झा तक है, कोई भूमिहार 24 इनटू 7, कोई राजपूत न्यूज तो को बाबाजी कम्युनिकेशन। हैरत तो तब हुई जब हममे से कई लोग अपनी जाति औऱ बिरादरी के हिसाब से उन चैनलों में जाने के लिए छटपटाते नजर आए। वो ऐसा करके अपने को सेफ जोन में मानते। उनके हिसाब से नौकरी मिल जाना ही काफी नहीं है, उसे बनाए,बचाए और उसकी जड़ों को मजबूत करते रहना ज्यादा जरुरी है। लोग जब हमसे पूछते हैं कि ये बड़े-बड़े पत्रकार जो देश बदल देने का दावा करते हैं, इधर-उधर कूंद-फांद क्यों मचाए रहते हैं। इसके जबाब में मैं सैलरी पैकेज और इगो प्रॉब्लम के अलावे कोई और कारण नहीं बता पाता। लेकिन जो नए पत्रकार हैं,बीच की स्थिति में हैं, उनके इधर से उधर जाने की वजह हैरान करनेवाली लगी। अपनी बिरादरी का बॉस खोजने में हमारे साथियों ने जो उर्जा लगाई उसे देखकर हैरानी होती है।

    न्यूज चैनल के लिए तत्काल चाहिए

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