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एक रिसर्च के मुताबिक 2010 तक अकेले भारत में ही सालाना 10 लाख लोगों की मौत तंबाकू की वजह से होगी। मीडिया की जिम्मेदारी बनती है कि समाज के सामने इस खतरे को रखे। गुजरात में भूकंप व बाढ़ के समय प्रभावितों को हेलीकॉप्टर से सिर्फ राहत सामग्री ही नहीं गिराई गई, बल्कि गुटखा पाउच भी फेंके गए। पूरी तरह से प्रायोजित तरीके से यह काम इसलिए किया गया ताकि फंसे हुए लोगों की तंबाकू न छूट जाए, जिससे देशी-विदेशी कंपनियों को नुकसान स्वाभाविक था

  • स‌ो रहा है मीडिया!

    अखबारों और टीवी चैनलों मेंलोक स‌रोकारों की बात तो खूब की जाती है लेकिन खुद मीडिया इस पर कितना अमल करता है यह किसी स‌े छिपा नहीं है। मीडिया को उसकी जिम्मेदारियों का एहसास कराने की कोशिश कर रहे हैं लोकेंद्र स‌िंह चौहान। उनका यह आलेख प्रभात किरण स‌े स‌ाभार लिया गया है।


    ये मीडिया की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वो लोगों के जीवन से हो रहे खिलवाड़ से सचेत करे? गांधी जयंती यानी दो अक्टूबर से पहले और दो दिन बाद तक मीडिया में तंबाकू गुटखा, बीड़ी- सिगरेट का खुले आम पीने-पिलाने पर रोक की खबरें सुर्खियों में रही। दो-चार दिन तक शहर के स्कूल-कॉलेजों के आसपास गुमटियों से बिक रहे गुटखे, बीड़ी-सिगरेट पर जोरदार आवाज उठी फिर क्या वजह है कि तीन दिन बाद ही इस मुद्‌दे को भुला दिया गयामीडिया को दूसरी हॉट खबर मिल गई तो ये मामला सिरे से गायब हो गया। कुछ दिन रोक के बाद फिर धड़ल्ले से स्कूल-कॉलेजों के पास गुटखा पाउच बिक रहे हैं। बीड़ी-सिगरेट बेची जा रही हैं। खुले आम धूम्रपान किया जा रहा है।

    एक किस्सा सुनाता हूं, एक राष्ट्रीय समाचार पत्र की रिपोर्टर से तंबाकू और धूम्रपान के खिलाफ खबर ना लिखने की वजह पूछी गई तो उसका जवाब हैरान कर देने वाला था। उसने कहा किहम अपने संपादक के खिलाफ कैसे लिख दें? जब भी उनसे मिलते हैं तो उनके और हमारे बीच धुआं जोर  रहता है।
    टोबेको प्रोडक्ट एक्ट-2003 के तहत सभी स्कूल-कॉलेजों, अन्य शैक्षणिक संस्थाओं से 100 मीटर की दूरी तक बीड़ी, सिगरेट और गुटखा आदि बेचना, रखना, खाना आदि पर रोक है। सरकारी कार्यालयों, अर्द्ध सरकारी कार्यालयों, निगमों व स्थानीय निकायों के कार्यालयों से सौ मीटर की दूरी तक गुटखा बेचने, बांटने, रखने पर रोक है। इनमें बैंक, नगर निगमनगरपालिका, पंचायत, राज्य परिवहन निगम आदि के ऑफिस शामिल हैं। नहीं मानने पर कम से कम छह माह और अधिकतम तीन साल तक की जेल व हजार रुपये दंड है। लेकिन आज तक इस मामले में कहीं कोई प्रकरण दर्ज नहीं किया गया। सार्वजनिक स्थानों पर बीड़ी-सिगरेट पीते पकड़े जाने पर 500 रुपये जुर्माना है। दोबारा पकड़े जाने पर तीन महीने की जेल और हजार रुपये दंड है।
    शहर में कोई गुटखा किंग अचानक समाजसेवी हो जाता है। समाज के कार्यक्रमों सहित अनेक आयोजनों में पैसा लगाता है। मीडिया उसकी वाहवाही के पुल बांधता है। उसकी खबरें छापता है। उसके फोटो सहित बड़े-बड़े विज्ञापन छपते हैं। ये सब क्या है? अगर मीडिया चाहे तो तंबाकू, बीड़ी-सिगरेट वाले मामले में लोगों को जागरूक कर सकता है, सरकार को चेता सकता है। जब तक हम सोए रहेंगे इस मामले में कुछ नहीं हो सकता।

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