अंबिका को चलता करना चाहते हैं चैनल
-समीक्षक
केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी आजकल सबकी लगाम कसने की खुशफहमी पालने वाले खबरिया चैनलों और उनके संपादकों की आंखों की किरकिरी बनी हुई हैं। खासकर 'दर्शक देखना चाहते हैं' जैसे जुमलों का इस्तेमाल करके गंदगी और कूड़ा परोसने वाले न्यूज चैनलों को तो अंबिका सोनी ने शुरू से ही आईना दिखाने का काम किया है। इसका सबसे पहला असर तो यह हुआ कि अपने हितों की बात आते ही सारे चैनलों के संपादक एक हो गए। अपना एक संगठन भी बना लिया और तुर्रा यह कि खुद चैनल ही अपने ऊपर लगाम कसेंगे। आंतरिक सेंसर लागू करेंगे। लेकिन हुआ वही ढाक के तीन पात।
दरअसल चैनलों के संपादकों की मंशा सुधरने की नहीं, बल्कि सरकार को धोखा देने की रही है। वर्ना क्या एक भी चैनल का संपादक बता सकता है कि संस्था बनाने के बाद उसने अपने चैनल के कंटेट में सुधार के लिए फलां-फलां प्रयास किए? नहीं किए। मंशा तो संगठन बनाकर सरकार पर दबाव बनाने की थी। सरकार को आंख दिखाने की थी कि हमसे पंगा मत लो, हम बहुत ताकतवर हैं। हमारी बहुत पहुंच है। लेकिन अंबिका सोनी पर चैनलों के ये सारे दबाव असर ही नहीं दिखा रहे हैं। अपने हथियारों को बेअसर होता देखकर चैनलों के संपादक बौखला उठे हैं। अब ये लोग सरकार में अपनी पहुंच का इस्तेमाल करके अंबिका सोनी को ही सूचना एवं प्रसारण मंत्री के पद से हटवाने की कवायद में जुट गए हैं।
यह विडंबना ही है कि खुद को मीडिया कहने वाले, जनता की आवाज बनने का दावा करने वाले ये चैनल संपादक आत्मविश्लेषण करने को तैयार नहीं है। ये वही लोग हैं जो कहते हैं कि हम तो वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं। यह वही लोग हैं जो खबर के नाम पर सनसनी फैलाने को खबर कहते हैं। इनकी जमात में वह भी शामिल हैं जो चैनल तो खोलकर बैठे हैं लेकिन खबरें पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि लोगों को बेवजह डराने के लिए। अंधविश्वास फैलाने के लिए। ऎसे चैनल संपादकों से एक बार एक ब्लॉगर ने पूछा था कि दर्शक तो ब्लू फिल्म भी देखना चाहते हैं, तो क्या आप दिखाएंगे?
यह सवाल आज भी कायम है। अब भी चैनल संपादकों के पास इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं है। इसी बीच वह एक और तर्क ढूंढकर ले आए हैं कि दर्शक के हाथ में रिमोट है। वह चाहे तो चैनल बदल सकता है। मतलब यह कि हम तो 'सब' परोसेंगे, दर्शक ही बेवकूफ है जो उसे देखने को नहीं मानता। इस तरह के हास्यास्पद तर्क देने वालों चैनल के संपादकों से पूछा जाना चाहिए कि वह ज्योतिष के नाम पर, तो कभी भविष्यवाणियों के नाम पर अफवाहें क्यों फैलाते हैं? ये चैनल ना जाने कितनी बार दुनिया के तबाह होने की घोषणा कर चुके हैं। सूर्यग्रहण जैसी घटना भी इनके लिए लोगों को डराने का जरिया है।
पिछले दिनों आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस रेड्डी के साथ हुए हेलीकाप्टर हादसे के दौरान तो चैनलों ने हद ही कर दी थी। किसी चैनल ने ये दावा किया कि वाईएसआर सही सलामत हैं तो किसी ने यह खबर तक दे डाली कि वाईएसआर ने फोन पर अपने घरवालों से बात की। यह चैनल यहीं तक सीमित नहीं रहे। थोड़ी देर बाद यह भी प्रसारित कर दिया कि वाईएसआर को जंगल में देखा गया है। हैरानी की बात तो यह है कि बिग बॉस के लिए नोटिस जारी करने के मसले पर भी चैनल वाले यही तर्क दे रहे हैं कि दर्शक चैनल क्यों नहीं बदल लेते। अब भला ऎसे कुतर्क करने वाले चैनलों पर अगर अंबिका सोनी लगाम कस रही हैं और कसने की कोशिश कर रही हैं तो इसे किस तरह नाजायज ठहराया जा सकता है? सिर्फ मीडिया की आजादी के नाम पर चैनलों को कुछ भी करने, कुछ भी दिखाने की छूट नहीं दी जा सकती। लेकिन मुश्किल तो यह है कि इन चैनलों के संपादक न तो कुछ समझने को तैयार हैं और न ही सोचने को। यह लोग मान बैठे हैं कि वह जो कर रहे हैं वही सही है।
अंबिका सोनी के तेवरों से बिलबिलाए बेलगाम चैनल संपादकों ने आजकल एक औऱ कोरस गाना शुरू कर दिया है। जब भी सरकार चैनलों को बेहूदगियों से बाज आने की हिदायत देती है तो ये लोग एक सुर में चिल्लाने लगते हैं कि सरकार निजी चैनलों को दूरदर्शन बनाना चाहती है। हकीकत तो यह है कि ये चैनल कभी चाहकर भी दूरदर्शन नहीं बन सकते। इसके लिए उन्हें खबर दिखानी होगी, जो टीआरपी के इन सौदागरों को गवारा नहीं है। ये लाइसेंस जरूर न्यूज चैनल का लेते हैं लेकिन दिन भर इंटरनेटमेंट चैनलों का जूठन और कूड़ा परोसते हैं और ये कहकर सीना ताने घूमते हैं कि वो खबरिया चैनल हैं। जहां फायदा लेना होता हैं वहां खुद के पत्रकार होने का दावा ठोंक देते हैं। जहां पैसा कूटना होता है वहां 'मैनेजर' भी बन जाते हैं।
निजी चैनलों के संपादक अक्सर दूरदर्शन पर सरकार का भोंपू होने का आरोप लगाते हैं। उनके इन आरोपों में दम है। लेकिन क्या कभी इन चैनलों के संपादकों ने अपने गिरेबां में झांककर देखा है। ज्यादातर चैनल सरकार के पिट्ठू हैं। कई चैनल तो खुलेआम सरकार का गुणगान करते हैं। कई चैनलों के लिए तो राहुल गांधी और सोनिया गांधी भगवान हैं। एक-दो चैनल तो कांग्रेसी चैनल तक कहे जाने लगे हैं। इन चैनलों पर हर वक्त गांधी परिवार का गुणगान ही छाया रहता है। गांधी परिवार पर स्पेशल कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। फिर भी इन चैनलों को खुशफहमी है कि वह दूरदर्शन से बेहतर हैं। सच तो यह है कि खबर बेचते-बचते इन चैनलों के संपादक भी बिकाऊ हो गए हैं।
अंबिका के काम करने के तरीके से इन चैनलों के संपादकों का बिलबिलाना लाजिमी है। हो सकता है उनकी ये बिलबिलाहट अंदर-अंदर कोई गुल खिला दे औऱ कल हम सबको यह सुनने को मिले कि अंबिका सोनी ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया या फिर सरकार ने उनका विभाग बदल दिया। जाहिरा तौर पर चैनल संपादकों के इरादे साफ हैं। जो उन्हें प्रेस की आजादी के नाम पर मनमानी नहीं करने देगा उसके लिए सरकार में काम करना आसान नहीं होगा। अब मंत्री महोदया इसे चाहे धमकी समझें या फिर चेतावनी।
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