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  • ये कैसा टीवी जो समाज को 'बीमार' कर रहा है?

    tvभारत में बेलगाम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस दौर में प्रायोजित रियलिटी शो के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा है, उसे देखकर लगता है कि केंद्र सरकार गांधी जी के तीन बंदरों की शिक्षा पर सौ फीसदी अमल कर रही है। उसने तय कर लिया है कि टीवी पर परोसे जा रहे कार्यक्रमों के बारे में वह न कुछ बोलेगी, न देखेगी और न ही सुनेगी। ये कार्यक्रम संवेदनशील भारतीयों को बेचैन-हैरान कर रहे हैं। वर्जनाओं को तोड़ रहे हैं। ये उन भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को ध्वस्त कर रहे हैं जिनके प्रति पश्चिमी देशों में भी सम्मान था। औद्योगिक घरानों के लिए 'सोने का अंडा देने वाली मुर्गी' बने इस टीवी ने विज्ञापन जुटाने की होड़ में ऐसे चौंकाने वाले कार्यक्रम परोसने शुरू कर दिए हैं जो हमारी मान्यताओं, विश्वासों और नैतिक वर्जनाओं की धज्जियां उड़ा रहे हैं। ये कार्यक्रम समाज में बीमारियां बांट रहे हैं।

    उपग्रह चैनलों पर प्रसारित कार्यक्रमों का एक दौर था जब टीवी की कथित महारानी एकता कपूर के सास-बहू मार्का जहरीले कार्यक्रम आम जनमानस को झकझोर रहे थे। भव्य लिबास और गहनों से लदी उनकी आधुनिक महिला पात्र विवाहेत्तर संबंधों, षडयंत्रों, हत्या और जालसाजी में लिप्त नजर आती थीं। यहां तक कि मां, बेटे और पत्नी-पति तक हत्या में परहेज नहीं करते थे। लोगों ने महसूस किया कि ये धारावाहिक स्त्री को खलनायिका के तौर पर स्थापित कर रहे हैं। महानगरों के दर्शक भले ही किसी सीमा तक एकता कपूर को बर्दाश्त कर पाए हों, लेकिन बाकी देश ने धीरे-धीरे उसे नकारना शुरू कर दिया। आज निरंकुश महारानी अर्श से फर्श पर आ गई है। स्त्री को पश्चिमी जीवन शैली की तर्ज पर छोटे पर्दे पर पेश करने की होड़ में इन धारावाहिकों के निर्माताओं ने सारी सीमाएं लांघ दीं।

    छोटे पर्दे पर सास-बहू की विदाई के बाद चैनल मालिकों और कार्य़क्रम निर्माताओं ने इस शून्य को भरने के लिए कथित रियलिटी शो का सहारा लिया। हर चैनल प्रायोजित रियलिटी शो तैयार करने में जुट गया। हकीकत तो ये है कि ये धारावाहिक नाम के 'रियलिटी शो' हैं, बाकी सब कुछ 'प्रायोजित' होता है। मकसद सिर्फ दर्शकों को चौंकाना, उनकी भावनाओं से खेलना और टीआरपी के खेल में बाजी मारना है। कार्यक्रम की 'शुरूआत' से लेकर 'अंत' तक पहले से ही तय कर दिए जाते हैं। बाकी सब 'ड्रामे' का सिलसिला जारी रहता है। 'स्वयंवर' शब्द की अवमानना करने वाले एनडीटीवी इमेजिन के 'राखी का स्वयंवर' कार्यक्रम के अंत में जो हुआ उससे न केवल चैनल की विश्वसनीयता दांव पर लगी, बल्कि राखी सावंत की कलई भी खुल गई। उसने वादा करके और सगाई की कथित रस्म अदायगी के बाद भी शादी नहीं की।


    स‌ूचना मंत्रालय चैनल 'लॉक' के हक में

    नईदिल्ली। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय टीवी पर दिखाए जाने वाले एडल्ट कंटेंट वाले प्रोग्रामों के मद्देनजर पैरंटल लॉक जैसी व्यवस्था पर विचार कर रहा है। मुमकिन है कि ऐसे प्रोग्रामों के लिए अलग से वक्त भी तय कर दिया जाए। ऐसा टीवी पर प्रसारित होने वाली सामग्री के लिए अपनी आचार संहिता को मजबूत बनाने के लिहाज से किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि ये दोनों प्रस्ताव सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी की इंडियन ब्रॉड कास्टिंग फाउंडेशन (आईबीएफ) और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) के प्रतिनिधियों के साथ ताजा मुलाकात के दौरान स‌ामने आए। अंबिका सोनी का मानना है कि ये मानदंड जब दुनिया भर में लागू हैं तो इन्हें भारत में भी लागू किया जाना चाहिए। इन प्रस्तावों को आखिरी रूप देने पर मंत्रालय और प्रसारकों के बीच अब भी विचार-विमर्श जारी है। विभिन्न पहलुओं पर दोनों पक्षों के बीच आम सहमति बनने में अभी कुछ वक्त लगेगा। मंत्रालय के एक सीनियर अफसर ने कहा कि ज्यादातर भारतीय परिवारों में अब भी एक ही टेलीविजन सेट है जहां बुजुर्ग सदस्य भी हैं। मंत्री का मानना है कि इस तरह का प्रावधान उनके लिए टेलीविजन देखने को सुखद अनुभव बनाने में मददगार होगा। मंत्रालय ने प्रसारकों को सुझाव दिया है कि इस तरह की व्यवस्था के तहत माता-पिता उन कुछ चैनलों को बंद करने में सक्षम हो सकेंगे जिसे वह किसी खास उम्र के अपने बच्चों के देखने के लायक नहीं मानते। मंत्री ने यह भी सुझाव दिया है कि एडल्ट टीवी प्रोग्रामों के लिए रात 11 बजे से सुबह 4 बजे तक का वक्त तय कर दिया जाए।


    अब एक बार फिर बिग बॉस का नया संस्करण लेकर अमिताभ बच्चन हाजिर हुए हैं। चैनल ने एक से बढ़कर एक 'नमूने' जुटाए हैं। बिग बॉस के घर में टीआरपी के खेल के लिए जो हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, वे हमारी नई पीढी और बच्चों के मन-मस्तिष्क पर क्या असर डालेंगे, सोचकर भी डर लगता है। प्रतियोगियों के तौर-तरीके और भाषा शैली किसी भी नजरिये से प्रसारण के काबिल नहीं कही जा सकती। उधर नशीले पदार्थों के सेवन के कारण पुलिस की गिरफ्त में आए और पिता की हत्या के बाद विवाह रचाने व तलाक लेने वाले राहुल महाजन को एनडीटीवी इमेजिन पर नायक के तौर पर पेश किया जा रहा है। राहुल का 'स्वयंवर' रचाया जा रहा है। वह आदर्श जीवन साथी तलाशने निकले हैं। इधर टीवी चैनलों में इस बात की होड़ है कि कैसे नकारात्मक चर्चा से अपना कार्यक्रम हिट करके मुनाफा कमाया जाए। समाज के प्रति कोई सरोकार नहीं है। नई पीढ़ी भ्रमित होगी इसकी चिंता उन्हें नहीं है।

    एक कड़वी हकीकत ये है कि निजी चैनलों पर जो कार्यक्रम परोसे जा रहे हैं वे पश्चिमी देशों के चर्चित कार्यक्रमों के भारतीय संस्करण हैं। लेकिन इनके निर्माता-निर्देशक यह नहीं सोचते कि पश्चिमी जनमानस की सोच व खुलेपन वाला परिवेश भारतीय संस्कारों से मेल नहीं खाता। पिछले दिनों विवादित रियलिटी शो 'सच का सामना' को ही लें। यह कार्यक्रम यौन संबंधों की विद्रूपता, विवाहेत्तर संबंधों, समलैंगिक रिश्तों, अवैध संबंधों की बुनियाद पर टिका रहा। ये बातें अमेरिका व यूरोपीय देशों में सच की दहलीज में उघाड़ी जा सकती हैं लेकिन भारतीय संदर्भ में अप्रासंगित और वर्जित हैं। भारत के हर व्यक्ति, जिसने यह कार्यक्रम देखा, उसने अपने आसपास के तमाम रिश्तों को संदेह से देखा। इस कार्यक्रम ने घर-घर की शांति को चोट पहुंचाई। कई हत्या व आत्महत्या के मामले प्रकाश में आए। संसद में भी शोर मचा। लेकिन देश के हुक्मरान खामोश बैठे रहे। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि चैनल निरंकुश हैं। सरकार खामोश है। टीआरपी की होड़ में राहुल महाजन सरीखे चरित्रों को नायक बनाया जा रहा है। सवाल यह है कि यह किस हद तक जाएगा? कौन अंकुश लगाएगा? (संपादकीय-दैनिक ट्रिब्यून-11 अक्टूबर, 2009)

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