रामगोपाल वर्मा की रण...
-नलिनी तिवारी राजपूत
रण फिल्म रिलीज होने और देखने के बाद, अब समझ आ रहा है कि मुंबई हमले के फौरन बाद रामगोपाल वर्मा, रितेश देशमुख के साथ ताज होटल क्यों पहुंच गए थे। उस वक्त काफी बवाल हुआ था। रितेश के पिता और महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री, विलासराव देशमुख को भी इस 'विजिट' के लिए दंश झेलना पड़ा था। उस वक्त ये बात साफ नहीं हो पाई थी कि रामू का वहां क्या काम ? लेकिन रण देखकर सब साफ हो गया।
कल रण देखने का मौका मिला। रण फिल्म का चस्का इस वजह से ज्यादा था क्योंकि ये फिल्म न्यूज चैनल की वर्किंग को लेकर बनी थी। फिल्म के प्रमोशन में अमिताभ बच्चन और रामगोपाल वर्मा तमाम न्यूज चैनल्स में घूमे भी थे। लेकिन हैरानी की बात ये है कि रामू ने पिक्चर बनने के बाद ही क्यों न्यूज रूम का दौरा किया... अगर पहले करते तो शायद फिल्म और भी बेहतर बन सकती थी। कम से कम फिल्म में इंडिया-24 पर चलने वाली ब्रेकिंग न्यूज और टिकर के लिखने में तो गलतियां नहीं होती--जैसे, झुठ, अतूल, फिसदी...अब तो आप को समझ आ ही गया होगा ना कि ब्लॉग के टाईटल में झूठ को 'झुठ' क्यों लिखा है। लेकिन फिल्म में कई ऐसी बातें है जो वाकई न्यूज चैनल्स में होती हैं। थीम अच्छा है।
शुरूआत से ही रामू ने ये दिखाने की कोशिश की कि न्यूज चैनल पर 3Cs भारी है... 3C मतलब क्राइम, सिनेमा (या सिलेब्रेटी) और क्रिकेट। रामू ने चैनल की नब्ज सही पकड़ी क्योंकि अधिकतर न्यूज चैनल्स में ज्यादा टाइम तक यही खबरें भरी पड़ी रहती हैं। न्यूज चैनल्स के विधाताओं का मानना है कि सिर्फ 3c ही टीआरपी दिला सकतें हैं। वैसे अब इस ट्रेंड में थोड़ा बदलाव भी आया है अब गंडे माला पहने तांत्रिक, भूत प्रेत, ज्योतिषी भी टीआरपी दिलवा सकते हैं।
रण देखते वक्त मुझे बिल्कुल ऐसा लगा कि असल न्यूज चैनल की कहानी दिखाई जा रही है। टीआरपी ना आने का मर्म, एक चैनल के नए प्रोग्राम का पहले ही लीक हो जाना, एक नया रिपोर्टर जो ये ठान कर आया है मीडिया जगत में कुछ अलग करेगा, बॉस का अपने चैनल के लोगों से कुछ हंगामें वाली स्टोरी करने को कहना, धमाकेदार इन्वेस्टिगेटिव स्टोरीज करवाना... ये सब एक न्यूज चैनल की हकीकत है। क्योंकि असल में ये बॉस लोगों की डिमांड रहती है कि "हंगामा हो"। वजह टीआरपी और सिर्फ टीआरपी होती है। अब बॉस लोगों को कौन समझाए कि रिपोर्टर का टीआरपी से क्या वास्ता। अगर बीच मीटिंग में बोलों तो स्थिति रण के पूरब शास्त्री जैसी। चारों तरफ से बीच मीटिंग में आप ऐसे घेरे जाएंगे जैसे चक्रव्यूह में फंसा कोई अभिमन्यु।
ये दूसरी चीज है कि बॉस ने हंगामा ‘क्रिएट’ ना करने को बोला हो लेकिन रिपोर्टर पर ये दबाव रहता है कि वो स्टोरी में हंगामा करवाए। ऐसे में कई रिपोर्टर वास्तविकता से भटक-कर स्टोरी क्रिएट करवा लेते है। ऐसे में अगर उसके ऊपर ‘बॉस का हाथ’ हो तो रिपोर्टर की बल्ले बल्ले। कई किस्से हुए जिसमें रिपोर्टर के साथ साथ उस चैनल के एडिटर पर भी उंगली उठी हो। कई बार ऐसा पढ़ने और देखने को मिला कि सेक्स रैकेट के जुड़े कई स्टिंग या स्टोरीज क्रिएट करवाई गई थी। बाद में बहुत हंगामा हुआ...चैनल को ऑफ एअर होना पड़ा...रिपोर्टर को अपनी नौकरी से हाथ धोना पडा़।
हर एक न्यूज चैनल में राजपाल यादव जैसे लोग मौजूद रहते हैं...जो ना सिर्फ चापलूसी में यकीन रखते हैं बल्कि चैनल्स में बॉस लोगों की क्या प्लानिंग चल रही हैं... इन्क्रीमेन्ट हो रहा है या नहीं, एक और चैनेल खुल रहा है, कितने लोगों को चैनल से निकाला जा रहा है.... बाप रे बाप ये सारी गॉसिप्स के पिटारे को वो ढोता रहता है। फिल्म में तो कम से कम राजपाल यादव एंकर तो था, लेकिन असल न्यूज चैनल की जिंदगी में तो कई, सिर्फ चाटुकारिता के बल पर इन्टस्ट्री में डटे हुए हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि वही चैनल के मालिक है....बाहर की बात बॉस तक और बॉस का मैसेज बाहर तक उनका यही काम रहता है। अगर बॉस की नजर में वो चापलूस अगर पास हो गया तो फिर क्या है। राजपाल यादव जैसे ही वो भी एक नए चैनल पर बड़ी पोस्ट या यू कहें चैनल हैड बनने के सपने देखने लगता है।
कई चैनलों में उद्योगपतियों, राजनीतिक दलों, बिल्डर और फिल्म इन्डस्ट्री से जुडे कई लोगों ने करोड़ों रूपए लगे हैं। कई चैनल सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के भी हैं। तो जाहिर सी बात है कि पत्रकारिता में राजनीतिक दलों का तो हस्तक्षेप रहेगा ही। रण फिल्म में प्रधानमंत्री के स्टिंग ऑपरेशन दिखाए जाने के कुछ दिनों बाद ही विजय हर्षवर्धन मलिक को ये लगने लगता है कि इंडिया-24 मोहन पांडे का पीआरओ बन बैठा है। लेकिन क्या असलियत में भी किसी चैनल को ऐसा लगता है....हकीकत तो ये है कई चैनल एक आधी पार्टी के पीआरओ ही बन बैठे हैं। एक ही पार्टी के नेताओ की खबरें और इन्टरव्यू देखने को मिलते हैं। कई बार रिपोर्टिग करते वक्त मैने पाया कि विपक्ष पार्टी के नेताओं ने खुलेआम उस चैनल पर आरोप लगा दिया हो। अभी जल्द ही मीडिया से ही जुड़े एक सज्जन ने बताया कि एक न्यूज चैनल पर आने वाले एक खास प्रोग्राम का प्रचार सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में ही होता है....क्यों... क्योंकि सोनिया गांधी इंडियन एक्सप्रेस ही पढ़ती हैं। ये बात हम सबने मजाक में उड़ा दी लेकिन इस बात में सच्चाई भी हो सकती है।
बस फिल्म में एक बात नहीं जमती ये कि पूरब शास्त्री ने चैनल में चल रहे गोरखधंधे को देखते हुए पत्रकारिता छोड़ने का मन बना लिया। हमेशा या यूं कहूं तो अधिकतर ऐसा नहीं होता है कि पत्रकारिता पर बाहर का दबाव रहता है। पत्रकार—खासतौर से एक क्राइम रिपोर्टर—अमूमन स्वतंत्र होता है। उसे सच्चाई और असलियत लिखने की आजादी रहती है। जो खबर जैसी हो उसे वैसा ही प्रेजेंट करने का हक होता है। फिल्म में आखिरकार सच्चाई की ही जीत हुई।
देश के चैनल्स की बात करें, तो एक-दुका चैनल्स को अपवाद मान कर छोड़ दे---और ये भी वो चैनल है जिनकी रेटिंग्स बहुत कम है या फिर टीआरपी की दौड़ से लगभग बाहर हैं—तो हमारे देश के अधिकतर चैनल्स निष्पक्ष है। उनका किसी भी राजनैतिक पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है। मीडिया में काम करने वाले व्यक्ति-विशेष का किसी पार्टी या नेता की तरफ झुकाव हो सकता है लेकिन चैनल का किसी और शायद ही हो। आजतक, स्टार न्यूज, इंडिया टी.वी, आईबीएन-7, जी न्यूज, एनडीटीवी की खबर देखने के बाद कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि ये चैनल किसी (पोलिटकल) पार्टी या नेता के माऊथपीस की तरह काम करे रहें हो।
मैने जिस चैनल में काम किया था, वो कांग्रेस के एक बड़े नेता का है। लेकिन वहां काम करते हुए मुझे (और बाकी पत्रकारों) को शायद ही कभी ये एहसास हुआ हो कि हम कांग्रेसी चैनल में काम करते हैं। लेकिन मैंने अपने पति से जरुर सुना है कि उन्होंने जिस अखबार—नेशनल हेराल्ड—में काम किया था, वहां सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस की तारीफ और बड़ाई वाली ही खबरें होती थी। करीब डेढ़ साल पहले नेशनल हेराल्ड बंद हो गया था। लेकिन अंदर की खबरें ये बता रही हैं कि जल्द ही राहुल गांधी के नेतृत्व और छत्र-छाया में ये अखबार जल्द ही बाजार में जोर-शोर से उतरने वाला है।
अखबारों में अमूमन ऐसा देखा गया है कि वो किसी ना किसी पार्टी की तरफ झुकाव रखते हैं। अंग्रेजी अखबार, हिंदुस्तान टाईम्स (हिंदी हिंदुस्तान) का किस पार्टी की ओर झुकाव है ये किसी से छिपा नहीं रहा है। द-हिंदु अखबार भी एक विशेष विचारधारा से प्रभावित है। ये दोनो वे अखबार है जो भारत के जाने-माने अखबार है। सर्कियुलेशन भी बहुत ज्यादा है। लेकिन टी.वी में पुछल्ले चैनल्स ही किसी ना किसी पार्टी लीडर या पार्टी के माऊथपीस हैं। लेकिन देश का सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाला अखबार, टाईम्स ऑफ इंडिया अभी भी अपनी निष्पक्ष खबरों के लिए जाना जाता है।
वैसे, रण फिल्म देखकर ऐसा लग रहा है कि जैसे अब हम—यानि पत्रकार—पुलिसवालों की श्रेणी में आ गए हैं। याद है ना किस तरह से मुंबईया फिल्मों में खाकीवर्दी को दागदार दिखाया जाता है। अपराधियों से सांठगांठ, किसी भी जगह पर सबसे बाद में पहुंचना, इत्यादि-इत्यादि...अब मीडियावालों को भी ऐसा ही कुछ कोप झेलना पड़ेगा। इस फिल्म से कुछ महीने पहले भी एक ऐसी ही हिंदी फिल्म, शोबिज़, आई थी। फिल्म बॉक्स-आफिस पर कुछ ज्यादा चल नहीं पाई। लेकिन उसमें भी मीडिया और एक क्राइम रिपोर्टर की कहानी दिखाई गई थी। अगर फिल्म देखगें तो, रामू की रण भूल जाएंगे। (नलिनी तिवारी के ब्लॉग Mediabiz से साभार)
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