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स‌ावधान ! मीडिया में नौकरी दिलाने के नाम पर सजी हैं ठगी की दुकानें

Reporterग्लैमर और चकाचौंध की वजह स‌े आज युवा वर्ग बड़ी तेजी स‌े मीडिया की तरफ आकर्षित हो रहा है। छोटे-बड़े शहरों के नौजवान नौकरी के लिए मीडिया का रुख कर रहे हैं। उनकी इसी ख्वाहिश का फायदा उठाकर अपना उल्लू स‌ीधा करने वाले भी बड़ी तादाद में पैदा हो रहे हैं। खासकर छोटे शहरों में मीडिया में नौकरी दिलाने और देने के नाम पर युवाओं स‌े मोटी रकम ऎंठी जा रही है। यह स‌ीधे-सीधे धोखा और जालसाजी है। कोई भी चैनल नौकरी देने के बदले में पैसा नहीं ले स‌कता। जो चैनल ऎसा करता है या जो व्यक्ति किसी चैनल के नाम पर पैसा मांगता है, उसके झांसे में न आएं। अगर आपसे कोई नौकरी के नाम पर पैसा मांगता है तो स‌मझिए की वो धोखाधड़ी कर रहा है। वैसे आजकल कुछ ऎसे चैनल भी कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं जिन्होंने इस व्यवस‌ाय को पैसे उगाहने का जरिया बना लिया है। नौजवानों स‌े गुजारिश है कि ऎसे चैनलों स‌े दूर ही रहें। कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश के ललितपुर में एक ऎसा ही मामला स‌ामने आया है, जिसे जानकारी के तौर पर हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। अगर आपके शहर में भी कोई ऎसा व्यक्ति या कोई गिरोह स‌क्रिय है तो हमें जरूर खबर करें। जालसाजों स‌े स‌ावधान रहें। -स‌ंपादक  

उत्तर प्रदेश के ललितपुर शहर में एक न्यूज चैनल के प्रतिनिधि बन कर आये दो युवकों ने जिले में घूम-घूम कर उन्हे अपना प्रतिनिधि बनाया और उसके ऐवज में दो-दो हजार रुपये वसूल कर रफूचक्कर हो गए। गनीमत रही कि पत्रकार बनने के बाद बेरोजगारों ने अपने कैमरे कार्यालय में जमा नहीं किए नहीं तोन जाने कितने वीडियो कैमरे ठग ले गए होते। ठगी का शिकार हुए युवक अब अपनी फरियाद पुलिस से लगा रहे है।

कुछ दिन पहले स्टेशन रोड पर एक इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का कार्यालय खुला। सुबह-सुबह दो युवक टिपटॉप होकर कार्यालय में बैठे। उन्होंने लोगों को बताना शुरू किया कि प्रख्यात सिने निर्माता निर्देशक सुभाष घई न्यूज चैनल लांच कर रहे है। इसके लिए जिला, तहसील व ब्लॉक स्तर पर संवाददाताओं की नियुक्तिया की जानी है। यह चैनल राष्ट्रीय होने के साथ-साथ प्रादेशिक भी होगा। पत्रकारिता की हनक से जिले का शायद ही कोई युवा प्रभावित न हो। खासतौर पर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का क्रेज कुछ ज्यादा ही है। जैसे ही उन्हे पता चला कि न्यूज चैनल के लिए जिले में सम्वाददाताओं की जरूरत है तो उनके कार्यालय में पत्रकार बनने के लिए कतार लगना शुरू हो गई। इसके अलावा कैमरा मैन, कार्यालय स्टाफ की नियुक्तियों के लिए भी आवेदन जमा कराये जाने लगे। सभी को बताया गया कि 12 हजार से 20 हजार के मध्य तनख्वाह दी जाएगी। न्यूज चैनल में नौकरी पाने के लिए युवक ही नहीं युवतियों में भी होड़ मच गई तथा स्थानीय कार्यालय पर लोगों की भीड़ उमड़ने लगी।

दिल्ली से आये तथाकथित पत्रकार नगर के ही एक होटल में अपना डेरा डाले हुए थे। बकायदा वह यहा अल्टो कार से आये थे। युवकों के हाव भाव से किसी को उन पर जरा भी शक नहीं हुआ। जितने भी आवेदन आये सभी आवेदकों को बताया गया कि उनके आवेदन नोयडा स्थित मुख्यालय को भेज दिये गए है। वहीं से उनके नियुक्ति पत्र जारी होंगे। कुछ दिनों बाद 4 युवकों के नियुक्ति पत्र और परिचय पत्र कार्यालय में प्राप्त हुए। उक्त चारों युवकों से 2-2 हजार रुपये जमा कराये गए। इसके बाद जितने भी आवेदक थे उनसे 2-2 हजार रुपये अग्रिम जमा कराने का सिलसिला शुरू हो गया। सभी को बताया गया कि कुछ ही दिनों के बाद उनके परिचय पत्र कार्यालय को प्राप्त हो जाएंगे। बकायदा कार्यालय में बैठकें भी होती रहीं और आवेदकों से जिले की भौगोलिक स्थिति के बारे में वह वार्ता करते रहे। उन्हे यह भी बताते रहे कि किस तरह से न्यूज चैनल के लिए उनको काम करना है।

4 अपै्रल को उन्होंने आवेदकों को बताया कि नोयडा मुख्यालय से कम्पनी के महाप्रबंधक आ रहे है, जो उनसे बात करेगे। उनके समक्ष सभी आवेदकों को वीडियो कैमरा लेकर उपस्थित होना है। वीडियो कैमरा न होने पर उनकी नियुक्ति खतरे में पड़ सकती है।

अब आवेदकों के समक्ष वीडियो कैमरा की जुगाड़ कर पाना कठिन हो गया था, क्योंकि अधिकाश ऐसे लोग थे जिन्होंने अपना मोबाइल व अन्य सामान बेचकर अथवा किसी से उधार लेकर 2 हजार रुपये का इतजाम किया था। अब आवेदकों ने इसके लिए किराये पर कैमरा लेने का तरीका ढूढा और वह फोटोग्राफरों के पास एक दिन के लिए वीडियो कैमरा तलाशने पहुंच गए। इनमें कुछ युवक ऐसे भी थे जिनके सम्बंध स्थानीय पत्रकारों से थे उन्होंने पत्रकारों से भी वीडियो कैमरा की व्यवस्था कराने की अनुविनय की। किसी राष्ट्रीय चैनल के जिला मुख्यालय पर कई सम्वाददाताओं की नियुक्ति और कार्यालय खुलने की बात स्थानीय पत्रकारों के गले नहीं उतरी और वह जानकारी करने के लिए कार्यालय पहुंच गए। यहीं से पत्रकार बनकर आये ठगों का खेल बिगड़ गया। उन्हे जब लगा कि शो सपाटा कुछ ज्यादा ही हो गया तो वह रात में ही अपना बोरिया बिस्तर समेट कर चम्पत हो गए। प्रात: रोज की तरह आवेदक कार्यालय पहुंचे तो वहा ताला लटका देखा। उन्होंने सोचा कि शायद बॉस लोग होटल से आये नहीं। वह उन्हे तलाशते हुए होटल पहुंचे तो पता चला कि यहा भी वह रात से नहीं आये। उन्होंने मोबाइल नम्बरों पर उनसे सम्पर्क किया तो उनसे बात नहीं हो सकी।

पोल तब खुली जब दिल्ली और नोयडा से आये नम्बरों पर सम्पर्क साधा गया तो पता चला कि यह किसी न्यूज चैनल के कार्यालय का नम्बर नहीं, बल्कि पीसीओ के है। यह तो गनीमत रही कि बेरोजगारों के कैमरे जाने से बच गए। यदि स्थानीय पत्रकार पूछताछ के लिए नहीं गये होते तो शायद पत्रकार बनने की लालच में बेरोजगार किराये पर लिये गए कैमरे ठगों के हाथों सौंप देते। ठगी का शिकार हुए युवकों ने अब पुलिस से कार्यवाही की माग की है। उन्होंने इस सम्बंध में पुलिस को प्रार्थना पत्र दिया है। यह भी पता चला है कि इन तथाकथित पत्रकारों ने तंत्र विद्या का खेल भी खेला था। उनके बारे में अब तक यह पता चल सका है कि वह दोनों मेरठ जिले के रहने वाले है। (याहू इंडिया)


भविष्य के पत्रकारों का स‌ामान्य ()ज्ञान

 इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का शार्ट कट 

मैं मीडिया में क्यों हूं? 

बिहारी हो, तो मीडिया में नौकरी पक्की!

अखबार के स‌ंपादक के नाम पाठक का पत्र

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