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नवभारतटाइम्स.कॉम में उपसंपादक (कॉपी एडिटर) की एक पोस्ट खाली है।

NBT

25/07/2010

हम अपने लिए एक ऐसा साथी चाहते हैं जिसने एक या दो साल तक कहीं काम किया हो। जर्नलिज़म में डिप्लोमा या डिग्री ज़रूरी नहीं लेकिन आज की पत्रकारिता क्या है, इसकी जानकारी उसे होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में उसकी पत्रकारिता की दुनिया सिर्फ आडवाणी-सोनिया- कांग्रेस-बीजेपी तक सीमित न हो बल्कि आसपास की हर खबर की भी उसको समझ हो।

हिंदी ऐसी हो कि आम पाठकों को समझ में आए और श्रीमती को श्रीमति न लिखता हो। अंग्रेज़ी का ज्ञान इतना कि सही-सही ईमेल लिख पाए और इंग्लिश से हिंदी में अनुवाद कर पाए। अंग्रेज़ी के शब्दों से नफरत न करता हो और डॉक्टर को डाक्टर न लिखता हो। टेक्नॉलजी से जो न घबराता हो। टि्वटर और फेसबुक जिसके लिए दूसरी दुनिया के शब्द न हों। और इनस्क्रिप्ट/ फनेटिक कीबोर्ड के अनुसार टाइप करना जानता हो।

अगर आप ऐसे हैं तो अपना रेज़्युमे (जी हां , इसे रिज़्यूम नहीं कहते) रविवार , 25 जुलाई 2010 तक इस ईमेल अड्रेस - nbtonline@indiatimes.co.in पर भेज दें। साथ में किसी भी पसंदीदा टॉपिक पर 500-700 शब्दों में एक लेख भी भेजें। लेख मंगल फॉन्ट में होगा तो सुविधा होगी वरना साथ में फॉन्ट भी भेजें। कुछ जानना हो तो भी इसी अड्रेस पर मेल करें। हम चाहेंगे कि इस नए साथी की उम्र 25-26 के आसपास हो। अच्छे कैंडिडेट के लिए दो साल का ग्रेस हो सकता है।

आखिर में एक ज़रूरी बात। भूलकर भी किसी की सिफारिश न लगवाएं। ऐसा होते ही आपकी ऐप्लिकेशन हंड्रेड वन पर्सेंट रद्द हो जाएगी। न सिर्फ इस बार के लिए बल्कि हमेशा के लिए।

मिक्स-मस‌ाला में तब्दील होती खबरें 

sanjayस‌ंजय द्विवेदी/16 जून, 2010 

ख़बर क्राइम की है तो कुछ खतरनाक शक्ल के लोग, खबर सिनेमा की है तो कुछ सुदर्शन चेहरे, ख़बर गंभीर है तो कुछ गंभीरता का लबादा ओढ़े चेहरे ! कुल मिलाकर मामला अब सिर्फ ख़बर तक नहीं है। ख़बर तो कहीं दूर बहुत दूर, खडी है...ठिठकी हुई सी। उसका प्रस्तोता (एंकर)  बताता है कि आप ख़बर को इस नज़र देखिए। वह यह भी बताता है कि इस ख़बर का असर क्या है और इस खबर को देख कर आप किस तरह और क्यों धन्य हो रहे हैं ! वह यह भी जोड़ता है कि यह ख़बर आप पहली बार किसी चैनल पर देख रहे हैं। दर्शक को कमतर और ख़बर को बेहतर बताने की यह होड़ अब एक ऐसी स्पर्धा में तब्दील हो गई है जहाँ ख़बर अपना असली व्यक्तित्व को खो देती है और वह बदल जाती है नारे में, चीख में, हल्लाबोल में या एक ऐसे मायावी संसार में जहाँ से कोई मतलब निकाल पाना ज्ञानियों के ही बस की बात है। [पूरा पढ़ें]

खबरें ही खो गई खबरों की दुनिया से

jrs-कनिका दत्ता

एस. बी. दत्ता ने इसे पढ़ने के लिए मुझे कंजूसी से पचास पैसे दिए जबकि मेरी मां ने भी इसका अध्ययन किया। मेरी बहनों ने भी इसे पढ़ा, पर इसकेपैसे नहीं दिए। ऐसे इकलौते संस्करण के बाद अखबार बंद हो गया। कई साल बाद जब मैंने पेशेवर पत्रकार के तौर पर अपना करियर शुरू किया तो मुझे लिखने से मिलने वाले संभावित उपहारों- घर, कार, शैंपेन (उदारीकरण के पूर्व इन चीजों तक पहुंच काफी मुश्किल होती थी), सोना, घड़ी, विदेश यात्रा आदि के बारे में बताया गया। लेकिन कोलकाता के अखबार की वामपंथी दुनिया में तेजी से विकास कर रहे बिजनेस पत्रकारिता को संदेह की नजर से देखा जाता था, इस चलन की इतनी आलोचना हुई कि ज्यादातर लोग इससे अलग हो गए। ज्यादातर मीडिया हाउस की तरह कंपनी की नीति के तहत उपहार लेने की सख्त मनाही थी। [पूरा पढ़ें]

सर, प्लीज एक बाइट दे दीजिए  

nalini-नलिनी तिवारी राजपूत/23,अप्रैल, 2010

मीडिया में ऐसे पत्रकारों की भी जमात है जो पुलिस अधिकारियों के पैर छूते है...जब तक प्रेस-कॉन्फ्रेंस के लिए पुलिस अधिकारी अपनी कुर्सी पर बैठ ना जाए तब तक बैठते तक नहीं है, स्टैंडिग पोजीशन में ऐसे खड़े रहते हैं जैसे कि पुलिस अधिकारी के मातहत हों। कई पत्रकार (इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और अखबार) तो पुलिसवालों को ‘भैया’ या ‘दीदी’ शब्दों से भी नवाजने से नहीं चूकते। कुछ रिपोर्टर तो अपराधियों और पुलिसवालों के बीच मिडिएटर तक बनने से नहीं हिचकते। आप को लग रहा हो कि ये सब हरकतें दूर-दराज के शहरों में स्ट्रिंगर्स करते होंगे। वहां तो पुलिसवालों की जीहुजूरी तो जमकर चलती है—अगर उनकी जीहुजूरी नहीं करेंगे तो ‘खबरें कैसे बनाएंगे’। लेकिन, जरा दम साध कर बैठ जाईये, ये सबकुछ करते हैं राजधानी दिल्ली के रिपोर्टर्स—जहां पर सभी बड़े-बड़े न्यूज चैनल्स और अखबारों के हेड ऑफिस हैं। अभी हाल ही में एक जाने-माने न्यूज चैनल ने खुलासा किया कि दिल्ली के एक गैंगस्टर की पार्टी में किस तरह कई पत्रकार नाच रहे थे। रिपोर्टर्स के अलावा दिल्ली पुलिस के भी कई बड़े अधिकारी मौजूद थे वहां । गैंगस्टर के खिलाफ दिल्ली के तमाम थानों में हत्या, हत्या की कोशिश, जमीन हड़पने के 100 से भी ज्यादा मामले दर्ज हैं। इतना ही नहीं कुछ रिपोर्टर्स पर गैंगस्टर को फरार करने में मदद करने का भी आरोप लगा।  [पूरा पढ़ें] 

रिपोर्टर या मीडिया के गुंडे? 

आज टीवी में आग लगा दूंगा

जानलेवा है न्यूज चैनलों का ये ड्रामा

VOन्यूज चैनलों में कामयाबी का यही फंडा है बॉस!

दूसरी लड़कियों की तरह ही एस‌जे भी उस चैनल में चंद रोज पहले ही आई थी। वैसे वह चैनल में जगह बनाने के लिए स‌ंघर्षरत 'आम' लड़कियों स‌े अलग थी। उसे मीडिया में एंट्री के लिए खास कवायद नहीं करनी पड़ी। उसके पिताजी दूरदर्शन में काफी स‌ीनियर पद पर थे। वहां स‌े रिटायर हुए तो एक निजी चैनल 'सब कुछ' में आकर जम गए। बेटी को भी उसी चैनल में लगवा दिया। बेटी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगी। चैनल की दूसरी लड़कियों को कोई पूछता तक नहीं थी, वहीं एसजे का जब जो मन करता था वही करती थी। बड़ी खबर होती थी तो रिपोर्टर बन जाती थी। जब मन करता था एंकर बनकर खड़ी हो जाती थी। चैनल की दूसरी लड़कियां काम कर करके खटती रहती थीं और उन्हें रिपोर्टिंग का मौका तक नहीं मिलता था। स‌ीनियर की बहुत चिरौरी करने के बाद कभी-कभार नाइट शिफ्ट में रिपोर्टिंग के लिए भेजा जाता था। एंकरिंग के लिए मौका मिलना तो खैर दूर की बात थी। [पूरा पढ़ें]

बीबीसी माफ करना, मैं हिंदुस्तानी हूं

BBC-रवींद्र रंजन

मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैंने बीबीसी की भाषा को लेकर एक स‌वाल उठाया था। सवाल यह था कि दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी और इंसानियत का दुश्मन ओसामा बिन लादेन सम्मान का हकदार कैसे? अभी तक तो हमने यही सुना है कि व्यक्ति के कर्म ही उसे महान बनाते हैं। कर्म ही सम्मान का हकदार बनाते हैं। लेकिन बीबीसी के लिए एक आतंकवादी भी सम्मानित है। कल्पना कीजिए कि अगर मुंबई हमले का गुनहगार आमिर अजमल कसाब बीमार हो जाए तो उसके बारे में लिखी गई बीबीसी की खबर का शीर्षक क्या होगा। शायद वह लिखेगा, 'बीमार हैं कसाब' या फिर 'बीमार हुए कसाब'। अब आप सोचिए कि कसाब के बारे में ऐसा संबोधन पढ़कर एक हिंदुस्तानी को कैसा लगेगा? हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें बीबीसी के इन भाषाई तौर-तरीकों में कोई बुराई नजर नहीं आती। वो बड़ी ही बेशर्मी से इसे बीबीसी की 'निष्पक्ष' पत्रकारिता कहते हैं। ऐसे लोगों से मैं पूछना चाहता हूं कि क्या वो महात्मा गांधी के हत्यारे के लिए ऐसा सम्मानजनक संबोधन पसंद करेंगे? क्या वो इंदिरा गांधी के कातिल के लिए 'उन्हें' या 'वे' जैसे संबोधन स्वीकार कर पाएंगे?  [पूरा पढ़ें] 


aबदनसीबों की मौत पर आंसू न बहाओ, जश्न मनाओ राहुल की शादी है  

राहुल की शादी है और जश्न है हिदुस्तान का...दूसरी तरफ इस चकाचौंध से बहुत दूर एक गांव है जहाँ कुछ देर पहले एक साधु आया था। पता नहीं क्या हुआ, वहां अब सन्नाटा पसरा है। पीछे से एक मां के कराहने की आवाज़ आ रही है जिसकी रुलाइयां है जो रोके रुक नहीं रहीं। वो सन्नाटे से आगे निकल कर उस आस्था पर सवाल उठा रही हैं जिसे वक्त-वक्त पर कोईन कोई साधु उसकी असफलता के साथ जोड़कर उसके पल्लू से बाँध देता है और फिर राम के नाम में विश्वास जताता है। वो एक रुमाल एक लौटा और बीस रुपये बाटता है तभी एक चीख पुकार आती है। कई लोग बदहवासी में इधर उधर भागने लगे। भीड़ अपनों और परायों में भेद नहीं कर पाई और फिर हर तरफ मातम। लोग बिखरे हुए थे। देश की संसद के साधु अपनी सियासत को खीच कर उस मां के कंधे पर हाथ रख रहे हैं, लेकिन वो आका भी सफलता और असफलता के बीच फस रहे हैं। बड़ी-बड़ी गाड़ियां इससे पहले उस जगह कभी नहीं आई। उस मां ने इतने करीब से इन लोगों को कभी नहीं देखा।[पूरा पढ़ें] 

अशोक स‌र बेटे के लिए लौट आइये न...


कुर्सी के लिए बेकरार अलग राज्य के पैरोकार

अंबिका सोनी को चलता करना चाहते हैं चैनलों के स‌ंपादक

मठाधीशों की धांधलियों का अड्डा अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय 

'तुम्हारा रेप करा देंगे किसी को पता भी नहीं चलेगा'

 रिश्तों के आईने में 'हिंदू विरोधी' मीडिया

पत्रकारिता के लिए अपने परिवार को भी दांव पर लगा दिया

 

sanjayस‌ंजय द्विवेदी/16 जून, 2010 

ख़बर क्राइम की है तो कुछ खतरनाक शक्ल के लोग, खबर सिनेमा की है तो कुछ सुदर्शन चेहरे, ख़बर गंभीर है तो कुछ गंभीरता का लबादा ओढ़े चेहरे ! कुल मिलाकर मामला अब सिर्फ ख़बर तक नहीं है। ख़बर तो कहीं दूर बहुत दूर, खडी है...ठिठकी हुई सी। उसका प्रस्तोता (एंकर)  बताता है कि आप ख़बर को इस नज़र देखिए। वह यह भी बताता है कि इस ख़बर का असर क्या है और इस खबर को देख कर आप किस तरह और क्यों धन्य हो रहे हैं ! वह यह भी जोड़ता है कि यह ख़बर आप पहली बार किसी चैनल पर देख रहे हैं। दर्शक को कमतर और ख़बर को बेहतर बताने की यह होड़ अब एक ऐसी स्पर्धा में तब्दील हो गई है जहाँ ख़बर अपना असली व्यक्तित्व को खो देती है और वह बदल जाती है नारे में, चीख में, हल्लाबोल में या एक ऐसे मायावी संसार में जहाँ से कोई मतलब निकाल पाना ज्ञानियों के ही बस की बात है। [पूरा पढ़ें]

खबरें ही खो गई खबरों की दुनिया से

jrs-कनिका दत्ता

एस. बी. दत्ता ने इसे पढ़ने के लिए मुझे कंजूसी से पचास पैसे दिए जबकि मेरी मां ने भी इसका अध्ययन किया। मेरी बहनों ने भी इसे पढ़ा, पर इसकेपैसे नहीं दिए। ऐसे इकलौते संस्करण के बाद अखबार बंद हो गया। कई साल बाद जब मैंने पेशेवर पत्रकार के तौर पर अपना करियर शुरू किया तो मुझे लिखने से मिलने वाले संभावित उपहारों- घर, कार, शैंपेन (उदारीकरण के पूर्व इन चीजों तक पहुंच काफी मुश्किल होती थी), सोना, घड़ी, विदेश यात्रा आदि के बारे में बताया गया। लेकिन कोलकाता के अखबार की वामपंथी दुनिया में तेजी से विकास कर रहे बिजनेस पत्रकारिता को संदेह की नजर से देखा जाता था, इस चलन की इतनी आलोचना हुई कि ज्यादातर लोग इससे अलग हो गए। ज्यादातर मीडिया हाउस की तरह कंपनी की नीति के तहत उपहार लेने की सख्त मनाही थी। [पूरा पढ़ें]

सर, प्लीज एक बाइट दे दीजिए  

nalini-नलिनी तिवारी राजपूत/23,अप्रैल, 2010

मीडिया में ऐसे पत्रकारों की भी जमात है जो पुलिस अधिकारियों के पैर छूते है...जब तक प्रेस-कॉन्फ्रेंस के लिए पुलिस अधिकारी अपनी कुर्सी पर बैठ ना जाए तब तक बैठते तक नहीं है, स्टैंडिग पोजीशन में ऐसे खड़े रहते हैं जैसे कि पुलिस अधिकारी के मातहत हों। कई पत्रकार (इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और अखबार) तो पुलिसवालों को ‘भैया’ या ‘दीदी’ शब्दों से भी नवाजने से नहीं चूकते। कुछ रिपोर्टर तो अपराधियों और पुलिसवालों के बीच मिडिएटर तक बनने से नहीं हिचकते। आप को लग रहा हो कि ये सब हरकतें दूर-दराज के शहरों में स्ट्रिंगर्स करते होंगे। वहां तो पुलिसवालों की जीहुजूरी तो जमकर चलती है—अगर उनकी जीहुजूरी नहीं करेंगे तो ‘खबरें कैसे बनाएंगे’। लेकिन, जरा दम साध कर बैठ जाईये, ये सबकुछ करते हैं राजधानी दिल्ली के रिपोर्टर्स—जहां पर सभी बड़े-बड़े न्यूज चैनल्स और अखबारों के हेड ऑफिस हैं। अभी हाल ही में एक जाने-माने न्यूज चैनल ने खुलासा किया कि दिल्ली के एक गैंगस्टर की पार्टी में किस तरह कई पत्रकार नाच रहे थे। रिपोर्टर्स के अलावा दिल्ली पुलिस के भी कई बड़े अधिकारी मौजूद थे वहां । गैंगस्टर के खिलाफ दिल्ली के तमाम थानों में हत्या, हत्या की कोशिश, जमीन हड़पने के 100 से भी ज्यादा मामले दर्ज हैं। इतना ही नहीं कुछ रिपोर्टर्स पर गैंगस्टर को फरार करने में मदद करने का भी आरोप लगा।  [पूरा पढ़ें] 

रिपोर्टर या मीडिया के गुंडे? 

आज टीवी में आग लगा दूंगा

जानलेवा है न्यूज चैनलों का ये ड्रामा

VOन्यूज चैनलों में कामयाबी का यही फंडा है बॉस!

दूसरी लड़कियों की तरह ही एस‌जे भी उस चैनल में चंद रोज पहले ही आई थी। वैसे वह चैनल में जगह बनाने के लिए स‌ंघर्षरत 'आम' लड़कियों स‌े अलग थी। उसे मीडिया में एंट्री के लिए खास कवायद नहीं करनी पड़ी। उसके पिताजी दूरदर्शन में काफी स‌ीनियर पद पर थे। वहां स‌े रिटायर हुए तो एक निजी चैनल 'सब कुछ' में आकर जम गए। बेटी को भी उसी चैनल में लगवा दिया। बेटी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगी। चैनल की दूसरी लड़कियों को कोई पूछता तक नहीं थी, वहीं एसजे का जब जो मन करता था वही करती थी। बड़ी खबर होती थी तो रिपोर्टर बन जाती थी। जब मन करता था एंकर बनकर खड़ी हो जाती थी। चैनल की दूसरी लड़कियां काम कर करके खटती रहती थीं और उन्हें रिपोर्टिंग का मौका तक नहीं मिलता था। स‌ीनियर की बहुत चिरौरी करने के बाद कभी-कभार नाइट शिफ्ट में रिपोर्टिंग के लिए भेजा जाता था। एंकरिंग के लिए मौका मिलना तो खैर दूर की बात थी। [पूरा पढ़ें]

बीबीसी माफ करना, मैं हिंदुस्तानी हूं

BBC-रवींद्र रंजन

मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैंने बीबीसी की भाषा को लेकर एक स‌वाल उठाया था। सवाल यह था कि दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी और इंसानियत का दुश्मन ओसामा बिन लादेन सम्मान का हकदार कैसे? अभी तक तो हमने यही सुना है कि व्यक्ति के कर्म ही उसे महान बनाते हैं। कर्म ही सम्मान का हकदार बनाते हैं। लेकिन बीबीसी के लिए एक आतंकवादी भी सम्मानित है। कल्पना कीजिए कि अगर मुंबई हमले का गुनहगार आमिर अजमल कसाब बीमार हो जाए तो उसके बारे में लिखी गई बीबीसी की खबर का शीर्षक क्या होगा। शायद वह लिखेगा, 'बीमार हैं कसाब' या फिर 'बीमार हुए कसाब'। अब आप सोचिए कि कसाब के बारे में ऐसा संबोधन पढ़कर एक हिंदुस्तानी को कैसा लगेगा? हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें बीबीसी के इन भाषाई तौर-तरीकों में कोई बुराई नजर नहीं आती। वो बड़ी ही बेशर्मी से इसे बीबीसी की 'निष्पक्ष' पत्रकारिता कहते हैं। ऐसे लोगों से मैं पूछना चाहता हूं कि क्या वो महात्मा गांधी के हत्यारे के लिए ऐसा सम्मानजनक संबोधन पसंद करेंगे? क्या वो इंदिरा गांधी के कातिल के लिए 'उन्हें' या 'वे' जैसे संबोधन स्वीकार कर पाएंगे?  [पूरा पढ़ें] 


aबदनसीबों की मौत पर आंसू न बहाओ, जश्न मनाओ राहुल की शादी है  

राहुल की शादी है और जश्न है हिदुस्तान का...दूसरी तरफ इस चकाचौंध से बहुत दूर एक गांव है जहाँ कुछ देर पहले एक साधु आया था। पता नहीं क्या हुआ, वहां अब सन्नाटा पसरा है। पीछे से एक मां के कराहने की आवाज़ आ रही है जिसकी रुलाइयां है जो रोके रुक नहीं रहीं। वो सन्नाटे से आगे निकल कर उस आस्था पर सवाल उठा रही हैं जिसे वक्त-वक्त पर कोईन कोई साधु उसकी असफलता के साथ जोड़कर उसके पल्लू से बाँध देता है और फिर राम के नाम में विश्वास जताता है। वो एक रुमाल एक लौटा और बीस रुपये बाटता है तभी एक चीख पुकार आती है। कई लोग बदहवासी में इधर उधर भागने लगे। भीड़ अपनों और परायों में भेद नहीं कर पाई और फिर हर तरफ मातम। लोग बिखरे हुए थे। देश की संसद के साधु अपनी सियासत को खीच कर उस मां के कंधे पर हाथ रख रहे हैं, लेकिन वो आका भी सफलता और असफलता के बीच फस रहे हैं। बड़ी-बड़ी गाड़ियां इससे पहले उस जगह कभी नहीं आई। उस मां ने इतने करीब से इन लोगों को कभी नहीं देखा।[पूरा पढ़ें] 

अशोक स‌र बेटे के लिए लौट आइये न...


कुर्सी के लिए बेकरार अलग राज्य के पैरोकार

अंबिका सोनी को चलता करना चाहते हैं चैनलों के स‌ंपादक

मठाधीशों की धांधलियों का अड्डा अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय 

'तुम्हारा रेप करा देंगे किसी को पता भी नहीं चलेगा'

 रिश्तों के आईने में 'हिंदू विरोधी' मीडिया

पत्रकारिता के लिए अपने परिवार को भी दांव पर लगा दिया

 

NewsRoom

चंडीगढ़ भास्कर स‌े दो लोग पहुंचे अमर उजाला

चंडीगढ़। दैनिक भास्कर चंडीगढ़ स‌े दो लोगों के अमर उजाला चंडीगढ़ का रुख करने की खबर है। पिछले आठ स‌ाल स‌े भास्कर में काम कर रहे स‌ब एडीटर अरविंद धवन ने अब अमर उजाला को अपना नया ठिकाना बना लिया है। वहीं चंडीगढ़ स‌े दैनिक भास्कर के लिए स‌ीबीआई कवर करने वाले आशीष तिवारी ने भी अमर उजाला का दामन थाम लिया है। आशीष इसस‌े पहले भी अमर उजाला स‌े ही दैनिक भास्कर आए थे। चंडीगढ़ भास्करस‌े और भी तीन चार लोगअगले महीने लांच होने वाले दैनिक आज स‌माज ज्वाइन करने वाले हैं। बताया जा रहा है किएक-दो लोगों को तो ऑफर लेटर भी मिल चुका है।

TVPLUS

आइये अपना अखबार निकालें-2  

paperवॉयस ऑफ मीडिया के पाठकों ने कई बार हमस‌े इस विषय में जानना चाहा है कि अपना एक अखबार या पत्रिका निकालने के लिए उन्हें क्या करना होगा। पाठकों की इसी मांग को देखते हुए हम किस्तों में यह जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं। जानकारी दे रहे हैं वरिष्ठ लेखक शिवप्रसाद भारती। आपको यह आलेख कैसा लगा, इस स‌ंबंध में अपनी प्रतिक्रियाओं स‌े जरूर अवगत कराएं। कोई स‌ंशय या स‌वाल हो तो बेहिचक हमें मेल करें-संपादक। editor@voiceofmedia.com

रजिस्ट्रार ऑफिस में आवेदन पत्र की जांच के बाद अगर मांगा गया शीर्षक यानी टाइटल मौजूद है तो उसे आवंटित कर दिया जाता है। इसके बाद एलॉटमेंट लेटर वापस जिला मजिस्ट्रेट को और उसकी एक कॉपी आवेदक को भेज दी जाती है। ध्यान रहे अभी आपको स‌िर्फ टाइटल एलॉट किया गया है। आपका अखबार आरएनआई में रजिस्टर्ड नहीं हुआ है। आरएनआई नंबर पाने के लिए पहले आपको अखबार या पत्रिका का प्रकाशन शुरू करना होगा। टाइटल मिलने के बाद अखबार प्रकाशित करने की प्रक्रिया बाद शुरू हो जाती है। स‌बसे पहले प्रकाशक/मालिक को शीर्षक आवंटन के कागजात स‌मेत स‌क्षम मजिस्ट्रेट/जिला मजिस्ट्रेट/अपर जिला मजिस्ट्रेट/नगर मजिस्ट्रेट/उप जिला मजिस्ट्रेट के स‌ामने उपस्थित होकर निर्धारित फार्म -1 पर घोषणा पत्र प्रमाणित करना होता है। [पूरा पढ़ें] 

उम्मीदें हैं तभी तो आलोचना है

 

pressआजकल मीडिया की आलोचना बढ़ गई है। मीडिया को बार-बार उसके सरोकार और दायित्वबोध की याद दिलायी जा रही है। यह स‌ब हैरत में डालने वाला है। यहां तक कि कभी पुलिस, नेता और पाकिस्तान से आगे न जाने वाली मंचीय कवियों के निशाने पर भी मीडिया है। असल में यह मीडिया की बढ़ती ताकत का ही सबूत है। यह साबित करता है कि मीडिया से लोगों की अपेक्षाएं बहुत बढ़ गयी हैं। इसी वजह स‌े बाकी स्तंभों से ज्यादा याद मीडिया की होती है। आज हर तरफ स‌े मायूस लोग हर बीमारी को मीडिया ताकत से दूर करना चाहते हैं। पहले सभी दरवाजों से निराश आदमी अखबार से दफ्तर में आता था। आज वह सबसे पहले अखबार या न्यूज चैनल के दफ्तर में पहुंचकर इंसाफ मांगता है। स्टिंग आपरेशन और भ्रष्टाचार कथाओं तक पत्रकारों की पहुंच खोज से कम, जनता के सहयोग से...[पूरा पढ़ें] 

ये कैसा टीवी जो समाज को 'बीमार' कर रहा है?

tvभारत में बेलगाम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस दौर में प्रायोजित रियलिटी शो के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा है, उसे देखकर लगता है कि केंद्र सरकार गांधी जी के तीन बंदरों की शिक्षा पर सौ फीसदी अमल कर रही है। उसने तय कर लिया है कि टीवी पर परोसे जा रहे कार्यक्रमों के बारे में वह न कुछ बोलेगी, न देखेगी और न ही सुनेगी। ये कार्यक्रम संवेदनशील भारतीयों को बेचैन-हैरान कर रहे हैं। वर्जनाओं को तोड़ रहे हैं। ये उन भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को ध्वस्त कर रहे हैं जिनके प्रति पश्चिमी देशों में भी सम्मान था। औद्योगिक घरानों के लिए 'सोने का अंडा देने वाली मुर्गी' बने इस टीवी ने विज्ञापन जुटाने की होड़ में ऐसे चौंकाने वाले कार्यक्रम परोसने शुरू कर दिए हैं जो हमारी मान्यताओं, विश्वासों और नैतिक वर्जनाओं की धज्जियां उड़ा रहे हैं। ये कार्यक्रम समाज में बीमारियां बांट रहे हैं...[पूरा पढ़ें]

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रोकना ही होगा अखबारों के इस 'काले धंधे' को 

जारी है अखबारों में 'मिलावट' के खिलाफ मुहिम

अब पानी स‌िर स‌े ऊपर चला गया है

मत पीटिए मीडिया के 'प्रोफेशनल' होने का ढिंढोरा

खबर लहरिया को यूनेस्को स‌म्मान

मीडिया में नौकरी दिलाने वालों स‌े स‌ावधान

खबरें जाएं भाड़ में, मुनाफा तो मनोरंजन में है

पत्रकार बेचारा, काम के बोझ का मारा

पांच मंडल के पत्रकारों को मान्यता की हरी झंडी

दूरदर्शन में अब भी है दम  

भाषाई स‌रोकार और मीडिया 

अब न्यूज चैनल की 'दुकान' खोलना आसान नहीं 

दागदार दिखा 2009 में  मीडिया का दामन

क्यों नहीं कर पाए स‌च का स‌ामना?

दोबारा शुरू हुआ एग्रीग्रेटर  ब्लॉगवाणी

कामयाबी उम्मीदें बढ़ाती है: विजेंद्र

जल्दी में हैं बाबा रामदेव?

मैडम फिजा कुछ तो तमीज स‌ीखिए... 

शर्मसार करता एक 'जनवादी' अखबार

भगवा ओढ़ने को बेकरार पीली छतरी वाले

जी की जय, बाकी चैनलों के लिए मंदी बनी शोषण का हथियार 

दिनामलार के स‌ंपादक को जमानत

अखबारों को ये क्या होता जा रहा है?

इतिहास हो गया जियो-सिटीज

'हम न तो कोई जवाब देंगे और न ही उन्हें गालियां देंगे'

अब हिंदी में होगा डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू...

हिंदी ब्लॉग जगत को तोहफा, नया एग्रीग्रेटर 'ब्लॉग प्रहरी' लांच

नहीं रहे खबरों के शिल्पकार डॉ. रामकष्ण पांडेय

आर्थिक पत्रकारिता: बढ़ रही है 'अर्थ' की अहमियत

अब आया यूएनआई टीवी

वीओआई शुरू, च्वाइस ऑफ इंडिया बनने की चाहत

हर चैनल की एक तमन्ना दिखना और बिकना है

हिंदुत्व के लिए अब कैसी जनक्रांति करेंगे कल्याण?

...तब गुरूजी जी पर ही इल्जाम क्यों? 

ब्लॉगिंग का मतलब स‌िर्फ अमिताभ बच्चन नहीं

दंतेवाड़ा का गुनहगार कौन?

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BeTheMediaanand

इच्छाधारी चैनलों की लीला

दिव्य दृश्य है. ऐसा ग्रह संयोग कम बनता है. दिन-रात बाबाओं स्वामियों और ज्योतिषाचार्यों की जय-जयकार करने वाले समाचार चैनलों ने अचानक इच्छाधारी बाबाओं और स्वामियों के खिलाफ अभियान-सा छेड़ दिया है. इसे समय का फेर ही कहना चाहिए कि चैनल इच्छाधारी बाबाओं और स्वामियों के अन्त:पुर की कहानियां चटकारे ले-लेकर बता रहे हैं. बाबाओं के सेक्स रैकेट, आपराधिक नेटवर्क और नैतिक पतन से लेकर आम जनता के प्रति उनकी असंवेदनशीलता (कृपालु महाराज प्रकरण) को लेकर उनकी खूब लानत-मलामत की जा रही है. वजह चाहे जो हो लेकिन चैनलों की सक्रियता का असर हुआ है. तमाम बाबाओं, स्वामियों और महाराजों को अपनी पोल खुलने का डर सताने लगा है. अयोध्या के साधुओं ने फैसला किया है कि वे [पूरा पढ़ें] 

एक चैनल को जरूरत है मरने वाले की

tv'जरूरत है एक ऐसे व्यक्ति की, जो जानता हो कि उसे टर्मिनल इलनेस (लाइलाज बीमारी, जिससे मौत सुनिश्चित हो) है। उस पर हम ममी बनाने की मिस्त्र की प्राचीन तकनीक का इस्तेमाल करना चाहते हैं।' ऐसा ही एक विज्ञापन इन दिनों ब्रिटेन के लोकप्रिय चैनल-4 और फैल्क्रम टीवी ने कई अखबारों और पत्रिकाओं में दिया है। दरअसल, चैनल-4 ममी बनाने की प्रक्रिया की लाइव डॉक्युमेंटरी बनाना चाहता है। लंदन के दैनिक टेलीग्राफ ने खबर दी हैकि चैनल एक ब्रिटिश वैज्ञानिक के साथ मिलकर इस काम को अंजाम देना चाहता है। इस वैज्ञानिक का दावा है कि...[पूरा पढ़ें] 

बेशर्मों की ब्रेकिंग न्यूज 

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सर आम जनता बहुत ही उतेजित और रोमांचित है लेकिन हालात अभी नियंत्रण में हैं। मैंने भीड़ की राय जानने की कोशिश की है। खैर मैं इस बारे में बाद में बताऊंगा पहले पूरी घटना विस्तार से बताता हूं। जैसा कि आप देख रहे हैं, अभी वे बदमाश जो नशे में धुत हैं, उस लड़की के कपडे फाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। रही बात पुलिस की तो यहां से निकटतम पुलिस थाना महज़ एक किलोमीटर पर स्थित है लेकिन पुलिस अभी भी यहां नहीं पहुंची है। आपको क्या लगता है कि उस लड़की के साथ बलात्कार होने की कोई संभावना है...[पूरा पढ़ें] 

टीवी को खारिज कर पाना नामुमकिन

hक्या टेलीविजन पत्रकारिता से सरोकार गायब हो गए हैं। क्या टेलीविजिन बुद्धू बक्से से आगे नहीं बढ़ पाया। क्या ये सच्चाई है। जब इस सवाल पर दिमाग पर थोड़ा जोर डालता हूं तो...[पूरा पढ़ें]

स‌ेब बेचने वाली  एंकर, आलू बेचने वाला रिपोर्टर

vinodसेब बेच रही टीवी एंकर से सेब खरीद कर आगे बढ़ गया। उत्पात मचा रहे एक सांड़ से बचने के लिये मैं तेजी से पैर बढ़ा रहा था कि पीछे से आती आवाज को सुनकर पैरों में ब्रेक लग गए...[पूरा पढ़ें]

न्यूज चैनल का प्रोड्यूसर

Ravindraबॉस को देखते ही वह बहुत व्यस्त हो जाता है। कभी फोन पर चीखता है। कभी जूनियर्स पर चिल्लाता है। कभी स‌िस्टम पर गुस्सा उतारता है। एक्टिव इस कदर है कि कई बार तो... [पूरा पढ़ें]

बिहारी हो तो मीडिया में नौकरी पक्की!

vineet ज्यादा बनो मत, स्साले बिहारी, तुम लोगों को तो बुलाकर नौकरी दी जाएगी। इसी लाइन को सुन-सुनकर कुछेक साउथ इंडियन क्लासमेट स्साले बिहारी बोलना सीख गयी थी और हम उन पर फिदा हो जाते...[पूरा पढ़ें]

न्यूज चैनल के लिए चाहिए

reporterआवेदक के अपराधियों से लेकर पुलिसवालों से अच्छे संबंध होने चाहिए। अगर आवेदक खुद ब्लैकमैलिंग,  चोरी, लूट बलात्कार जैसे अपराध में जेल जा चुका है या...[पूरा पढ़ें]

मीडिया का शार्ट कट 

ashishलड़की कुछ अधिक समझदार थी। दिल्ली के राष्ट्रीय चैनल में तरक्की पर तरक्की पाए जा रही थी। मीडिया में चर्चा थी। वह आजकल मिस्टर झा की खास हैं। देखते देखते वह चाय की दुकान से लेकर...[पूरा पढ़ें]

स‌ंपादक के नाम पत्र

LettersToTheEditorमैंने अपनी कई रचनायें भी आपको प्रकाशनार्थ भेजी थीं, लेकिन पता नहीं क्यों वो प्रकाशित नहीं हुईं। जरूर वो आप जैसे विद्वान की आंखों के सामने से नहीं गुजर सकी होंगी। मैं बचपन से ही...[पूरा पढ़ें]

मेरे पास तो कोई प्लान नहीं है बॉस !

bossजैसे कि हर मीटिंग के बाद होता है, बाहर निकल कर लोगों ने अपने चैनल को गाली दी। साथ ही अपने मन में पल रहे उस कीड़े को फिर से चारा डाला, जो रोज़ तुमसे ये कहता है कि...[पूरा पढ़ें]

अफेयर न होने का अफसोस

affairइन लड़कियों को ग्लैमर में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी या फिर वैसा कभी मौका नहीं मिला। इसलिए बॉस के बारे में वही राय रखती जो कि हम सब गुपचुप तरीके से रखते थे। हममें से ज्यादातर लोग चों-चों करने वाले कपल को गरियाते। जाकर पूछते,चलोगी लंच करने और हममे से ही कोई...[पूरा पढ़ें]

एक्सक्लूसिव और ब्रेकिंग के बीच तड़पतीं खबरें

sanjayअपराध, सेक्स, मनोरंजन से जुड़ी खबरें मीडिया की आजमायी हुई सफलता का फंडा है। हमारी नैसर्गिक विकृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाली खबरें खबरिया चैनलों पर अगर ज्यादा जगह पाती हैं तो यह पूरा का पूरा मामला...[पूरा पढ़ें]


ब्रेक स‌े पहले

धनुष ब्रेक की ब्रेकिंग न्यूज

डाकू का 'एक्स‌क्लूसिव' स‌रेंडर

ब्रेकिंग न्यूज की मजबूरी क्यों? 

मुजरिम की मुस्कान और मीडिया

स‌ब कुछ तय करने की चैनलाई रस्साकशी

एक जांबाज पत्रकार का यूं चले जाना...

राजेंद्र अवस्थी: काल चिंतन के चितेरे


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